इटारसी।शहर से महज 18 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी बहती है। तवा बांध में पानी का विकल्प मौजूद है। करोड़ों रुपये खर्च कर नर्मदा जल आवर्धन योजना भी बनाई गई, लेकिन इसके बावजूद इटारसी के कई वार्डों में पेयजल की समस्या बनी हुई है। अब जब मानसून ने भी इस साल साथ नहीं दिया और इटारसी तहसील में सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम बारिश हुई है, तब आने वाली गर्मी को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
हैरानी की बात यह है कि संकट फरवरी-मार्च में गंभीर होने की आशंका है, लेकिन इसके संकेत अभी नवंबर से ही दिखाई देने लगे हैं। वार्ड 4 में पानी के लिए हस्ताक्षर अभियान चल चुका है। पुरानी इटारसी, वार्ड 33 और बंगाली कॉलोनी में पहले भी नागरिकों को गंदे पानी की समस्या से जूझना पड़ा है। कहीं पाइपलाइन से हजारों लीटर पानी बहकर नाले में जा रहा है तो कहीं लोग नियमित जलापूर्ति के लिए शिकायतें कर रहे हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ मानसून की बेरुखी का नहीं है। असली सवाल यह है कि उपलब्ध जल संसाधनों का प्रबंधन कितना बेहतर है? शहर को प्रतिदिन कितना पानी मिल रहा है? वितरण के दौरान कितने पानी की बर्बादी हो रही है? और सबसे महत्वपूर्ण, नर्मदा जल आवर्धन योजना से वास्तव में कितने घरों को नियमित पेयजल मिल रहा है?
12 जिलों में सूखे जैसे हालात, नर्मदापुरम भी प्रभावित
इस साल मध्यप्रदेश के 12 जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। इनमें नर्मदापुरम भी शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिले में सामान्य से करीब 33 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। आलीराजपुर में 51 प्रतिशत, धार में 40 प्रतिशत, झाबुआ और रतलाम में 35 प्रतिशत तथा बैतूल में 31 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई।
कम बारिश का असर केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। इससे भूजल पुनर्भरण प्रभावित होता है। हैंडपंप, बोरिंग और अन्य स्थानीय जलस्रोतों पर दबाव बढ़ता है। यही स्थिति आने वाले महीनों में पेयजल व्यवस्था को चुनौतीपूर्ण बना सकती है।
राज्य सरकार ने प्रभावित जिलों से कम बारिश के कारण पैदा हुई समस्याओं और उनसे निपटने के लिए आवश्यक खर्च का आकलन करते हुए कार्ययोजना मांगी है। सूखा घोषित किए बिना भी प्रभावित जिलों को अधिकतम आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। पेयजल योजनाओं के लिए अतिरिक्त राशि जारी करने की संभावना भी इन्हीं विकल्पों में शामिल है।
इटारसी में अभी से दिखने लगे संकट के संकेत
शहर के अलग-अलग वार्डों में सामने आई शिकायतें बताती हैं कि पेयजल समस्या नई नहीं है।
वार्ड 4 में हस्ताक्षर अभियान: अक्टूबर में पानी की समस्या से परेशान नागरिकों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। पार्षद द्वारा कई बार शिकायत किए जाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं होने की बात सामने आई। नगर पालिका ने टेंडर प्रक्रिया जारी होने और 19 अक्टूबर के बाद काम शुरू कराने की बात कही थी।
वार्ड 33 और पुरानी इटारसी: जुलाई में ही पेयजल समस्या को लेकर नागरिकों को चक्काजाम करना पड़ा था। बंगाली कॉलोनी सहित कई क्षेत्रों में आठ से नौ दिन तक गंदा, काला और बदबूदार पानी मिलने की शिकायतें सामने आई थीं।
धौखेड़ा पाइपलाइन में बर्बादी: एक तरफ नागरिक पानी के लिए परेशान हैं, दूसरी तरफ पाइपलाइन फटने से हजारों लीटर पेयजल सड़क पर बहकर नाले में जाने की घटना सामने आई। कम बारिश वाले साल में इस तरह की लापरवाही को सामान्य तकनीकी खराबी कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो स्पष्ट होता है कि शहर को आगामी गर्मी के लिए केवल अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं है, बल्कि मौजूदा पानी को बचाने और समान रूप से वितरित करने की भी जरूरत है।
5 नवंबर के विशेष सम्मेलन में बचत के फैसले, लेकिन जवाबदेही पर भी हो बात
आगामी फरवरी और गर्मी में संभावित जल संकट से निपटने के लिए 5 नवंबर को विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा की मौजूदगी में नगर पालिका का विशेष सम्मेलन हुआ। इसमें कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।
सप्ताह में एक दिन जलप्रदाय बंद: पानी की बचत के लिए सप्ताह में एक दिन 24 घंटे जलप्रदाय बंद रखने पर विचार किया गया है। इसे लागू करने से 15 दिन पहले नागरिकों को सूचना दी जाएगी।
वाशिंग सेंटरों पर प्रतिबंध: जुलाई 2027 तक टू-व्हीलर और फोर-व्हीलर वाशिंग एवं सर्विस सेंटरों के संचालन पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।
पानी की बर्बादी पर जुर्माना: पाइप से वाहन अथवा सड़क धोने पर पहली बार 1000 और दूसरी बार 2000 रुपये जुर्माना लगाने का प्रावधान है।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग: 1500 वर्गफीट से बड़े भवनों में हार्वेस्टिंग व्यवस्था नहीं होने पर 5000 रुपये जुर्माना और बाद में 10 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव है। इसके बावजूद पालन नहीं करने पर भवन अनुज्ञा निरस्त करने का प्रावधान रखा गया है।
तवा डैम से पानी की तैयारी: प्रशासन और सिंचाई विभाग से तवा का पानी पेयजल के लिए सुरक्षित रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर नदी में पानी छोड़कर मेहराघाट जल आवर्धन योजना से शहर को पानी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया जाएगा।
बोरिंग पर नियंत्रण: शहर में अंधाधुंध बोरिंग पर रोक जारी रहेगी। जरूरत वाले दूरस्थ और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जांच के बाद अनुमति दी जाएगी।
ये प्रस्ताव जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इनसे एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। जब नागरिकों से पानी बचाने के लिए एक दिन जलप्रदाय बंद करने और जुर्माना देने की अपेक्षा की जा रही है, तब नगर पालिका अपनी जलापूर्ति व्यवस्था की जवाबदेही किस तरह तय करेगी?
तीन सवाल, जिनका जवाब शहर को मिलना चाहिए
1. शहर को प्रतिदिन कितना पानी मिल रहा है?
नगर पालिका को सार्वजनिक करना चाहिए कि नर्मदा जल आवर्धन योजना, स्थानीय जलस्रोतों और अन्य माध्यमों से प्रतिदिन कितने एमएलडी पानी की उपलब्धता है। गर्मियों में शहर की वास्तविक जरूरत कितनी होगी और उपलब्धता के मुकाबले कितना अंतर रहने की आशंका है? वार्डवार जलापूर्ति का भी विवरण सामने आना चाहिए।
2. कितने पानी की बर्बादी हो रही है?
धौखेड़ा पाइपलाइन जैसी घटनाएं बताती हैं कि जलापूर्ति व्यवस्था में लीकेज और तकनीकी खामियों पर नियमित निगरानी की जरूरत है। शहर की मुख्य पाइपलाइनों का सर्वे कराया जाए। पानी की टंकियों, वितरण नेटवर्क और घरेलू कनेक्शनों तक पहुंचने वाले पानी का ऑडिट हो। प्रतिदिन कितना पानी सप्लाई होता है और कितना लीकेज में बर्बाद होता है, इसका आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए।
3. नर्मदा जल आवर्धन योजना से कितने घरों को नियमित पानी मिल रहा है?
करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद इस योजना का वास्तविक लाभ कितने परिवारों को मिल रहा है? कितने वार्डों में नियमित आपूर्ति है? किन इलाकों में अब भी पुराने जलस्रोतों या टैंकरों पर निर्भरता है? योजना की क्षमता, वास्तविक आपूर्ति और वितरण की स्थिति का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण होना चाहिए।
इन तीन सवालों के जवाब सामने आए बिना केवल पानी बचाने की अपील और प्रतिबंधों से पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं होगी।
अब जरूरत वार्डवार जल संकट कार्ययोजना की
आने वाली गर्मी को देखते हुए नगर पालिका और जिला प्रशासन को अभी से वार्डवार कार्ययोजना बनानी चाहिए। इसमें उन इलाकों को प्राथमिकता दी जाए जहां पहले से जल संकट की शिकायतें हैं।
प्रत्येक वार्ड में जलस्रोतों की स्थिति, हैंडपंपों की उपयोगिता, बोरिंग का जलस्तर, पाइपलाइन की स्थिति और संभावित मांग का आकलन किया जाना चाहिए। जिन इलाकों में नियमित जलापूर्ति नहीं हो पा रही है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था पहले से तय होनी चाहिए।
तवा डैम से पानी लेने की योजना पर सिंचाई विभाग के साथ समय रहते तकनीकी और प्रशासनिक समन्वय जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर कितना पानी उपलब्ध कराया जा सकता है और उसे शहर तक पहुंचाने की व्यवस्था क्या होगी।
साथ ही रेन वाटर हार्वेस्टिंग को केवल जुर्माने का विषय बनाने के बजाय सरकारी भवनों, स्कूलों, अस्पतालों, बड़े व्यावसायिक परिसरों और सार्वजनिक स्थानों पर प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
सवाल मानसून का नहीं, जल प्रबंधन का भी है
कम बारिश प्रकृति के हाथ में है, लेकिन उपलब्ध पानी को बचाना, उसका समुचित वितरण करना, लीकेज रोकना और वैकल्पिक जलस्रोत तैयार रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
नर्मदापुरम जिले में कम बारिश और इटारसी में पहले से मौजूद पेयजल समस्याओं को देखते हुए इस बार तैयारी का समय अभी है। फरवरी और मार्च में जब पानी की मांग बढ़ेगी, तब प्रतिबंध लगाना और टैंकर दौड़ाना पर्याप्त नहीं होगा।
नर्मदा नदी की निकटता, तवा डैम का विकल्प और करोड़ों की जल आवर्धन योजना शहर के लिए संसाधन हैं। इनका वास्तविक लाभ नागरिकों तक पहुंचना चाहिए।
शहर को यह जानने का अधिकार है कि उसके हिस्से में कितना पानी है, कितना पानी बर्बाद हो रहा है और करोड़ों की योजना के बावजूद उसके नल सूखे क्यों हैं।
इस बार गर्मी में इटारसी के सामने केवल कम बारिश की चुनौती नहीं होगी, बल्कि नगर पालिका के जल प्रबंधन की भी परीक्षा होगी।