लाइफस्टाइल फीचर | हमारा निशाना
इटारसी // दीपावली आते ही घरों में रौनक बढ़ जाती है। कहीं सफाई और सजावट की तैयारी शुरू हो जाती है, तो कहीं मिठाइयों की खुशबू और नए कपड़ों की खरीदारी उत्सव का अहसास कराने लगती है। बाजार रोशनी से जगमगाने लगते हैं और घरों में पूजा की तैयारियां होने लगती हैं। यह तस्वीर आज भी बहुत कुछ वैसी ही है, जैसी दशकों पहले हुआ करती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब त्योहार मनाने के तरीके बदल गए हैं।
कभी दीपावली की तैयारी कई दिन पहले घर की सफाई, हाथों से सजावट बनाने, बाजारों में खरीदारी और घर में पकवान तैयार करने से शुरू होती थी। अब मोबाइल की एक स्क्रीन पर सजावट से लेकर उपहार और मिठाइयों तक का ऑर्डर दिया जा सकता है। शुभकामनाओं के लिए डाक से कार्ड भेजने की जगह व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया ने ले ली है। यादें अब फोटो एलबम के बजाय मोबाइल की गैलरी में सिमट रही हैं।
यानी दीपावली का उत्साह और उल्लास आज भी कायम है, लेकिन उसे मनाने का अंदाज तेजी से बदल रहा है। परंपरा और तकनीक अब एक ही उत्सव के दो अहम हिस्से बन गए हैं।
सजावट में हाथों की कला से बाजार की चमक तक
एक समय था जब दीपावली की सजावट पूरे परिवार का साझा काम हुआ करती थी। रंगीन कागज की झालरें बनाना, फूलों की मालाएं तैयार करना, घर के आंगन में रंगोली सजाना और मिट्टी के दीयों को रंगना बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए उत्सव का हिस्सा होता था।
अब बाजार में सजावट के अनगिनत विकल्प मौजूद हैं। एलईडी लाइट्स, इलेक्ट्रिक झालरें, रेडीमेड रंगोली, कृत्रिम फूल, डिजाइनर तोरण और थीम आधारित डेकोरेशन ने सजावट को आसान और आकर्षक बना दिया है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी घर की सजावट के लिए पूरी रेंज उपलब्ध है।
हालांकि, आधुनिक सजावट के बीच मिट्टी के दीयों और हाथ से बनाई गई रंगोली का आकर्षण अब भी बरकरार है। कई परिवार पारंपरिक दीयों के साथ आधुनिक लाइटिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि नई पीढ़ी परंपरा को छोड़ नहीं रही, बल्कि उसमें अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार नए रंग जोड़ रही है।
फूलों और पत्तों से सजते हैं घर, लोक परंपरा की अपनी पहचान
इटारसी और आसपास के ग्रामीण अंचलों में दीपावली की सजावट का एक पारंपरिक अंदाज आज भी दिखाई देता है। यहां घरों के दरवाजों और दुकानों सहित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सजाने के लिए केले के पत्तों, मौसमी फूलों, गेंदे के पौधों और खेतों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाली झाड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय लोग इन झाड़ियों को 'केसर' कहते हैं। बाजार में मिलने वाली रेडीमेड सजावटी सामग्री और बिजली की झालरों के दौर में भी प्रकृति से जुड़ी यह सजावट स्थानीय परंपरा की अलग पहचान बनाए हुए है। यह केवल घरों को सजाने का तरीका नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और प्रकृति के साथ उत्सव के जुड़ाव को भी दर्शाता है।
बाजार की जगह मोबाइल ने ली, खरीदारी का अंदाज बदला
कभी दीपावली की खरीदारी अपने आप में एक उत्सव हुआ करती थी। परिवार के साथ बाजार जाना, कपड़े पसंद करना, मिठाइयों की दुकानों पर भीड़ देखना और उपहार खरीदना त्योहार की तैयारियों का अहम हिस्सा था।
अब ऑनलाइन शॉपिंग ने खरीदारी का तरीका बदल दिया है। कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू उपकरणों, सजावटी सामान और उपहारों की खरीदारी मोबाइल से हो रही है। घर बैठे सामान चुनने, कीमतों की तुलना करने और दरवाजे तक डिलीवरी की सुविधा ने लोगों का समय और मेहनत दोनों बचाए हैं।
इसके बावजूद बाजारों की रौनक कम नहीं हुई है। दीपावली के दौरान बाजारों में उमड़ती भीड़, दुकानों की सजावट और खरीदारी का उत्साह आज भी त्योहार की पहचान है। अंतर इतना है कि अब पारंपरिक बाजार के साथ डिजिटल बाजार भी उत्सव की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन गया है।
रसोई की खुशबू के साथ ऑनलाइन ऑर्डर का स्वाद
दीपावली और पकवानों का रिश्ता हमेशा से खास रहा है। घरों में कई दिन पहले से मिठाइयां, नमकीन, गुजिया, शक्करपारे और दूसरे पारंपरिक व्यंजन बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। रसोई में उठती खुशबू ही त्योहार के आने का अहसास करा देती थी।
अब कामकाजी जीवनशैली और समय की कमी ने इस परंपरा में कुछ बदलाव किए हैं। बाजार की मिठाइयां, पैकेज्ड फूड और ऑनलाइन फूड डिलीवरी का चलन बढ़ा है। लोग पारंपरिक पकवानों के साथ नए स्वाद और दूसरे शहरों की खास मिठाइयां भी मंगवाने लगे हैं।
हालांकि, घर में अपने हाथों से कुछ खास बनाने की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई परिवार बाजार से मिठाइयां खरीदने के साथ घर में भी कुछ पकवान तैयार करते हैं। त्योहार की मेज पर अब परंपरागत स्वाद और आधुनिक पसंद दोनों की जगह है।
शुभकामनाओं में दूरी कम, रिश्तों का अंदाज डिजिटल
पहले दीपावली की शुभकामनाएं देने के लिए रिश्तेदारों और परिचितों के घर जाना, फोन करना या डाक से ग्रीटिंग कार्ड भेजना आम बात थी। शुभकामना कार्ड चुनने और उस पर अपने हाथों से संदेश लिखने का भी अलग आनंद था।
अब व्हाट्सऐप संदेश, डिजिटल ग्रीटिंग कार्ड, वीडियो कॉल और सोशल मीडिया पोस्ट ने बधाई देने का तरीका बदल दिया है। एक ही संदेश कुछ सेकंड में सैकड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। विदेशों या दूसरे शहरों में रहने वाले परिजन भी वीडियो कॉल के जरिए पूजा और पारिवारिक उत्सव में शामिल हो जाते हैं।
युवा पीढ़ी दीपावली की तस्वीरें, वीडियो और रील्स साझा कर अपने उत्सव को डिजिटल दुनिया का हिस्सा बना रही है। हालांकि, इस सुविधा के बीच व्यक्तिगत मुलाकात और अपने हाथों से लिखे संदेशों की आत्मीयता आज भी अलग महत्व रखती है।
फोटो एलबम से मोबाइल गैलरी तक पहुंचीं यादें
पहले दीपावली की तस्वीरें खिंचवाना भी एक खास आयोजन होता था। परिवार के सभी सदस्य नए कपड़ों में एक साथ बैठकर फोटो खिंचवाते थे। बाद में उन तस्वीरों को धुलवाकर एलबम में सजाया जाता था और वर्षों तक सहेजकर रखा जाता था।
अब स्मार्टफोन ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। पूजा, सजावट, रंगोली, पकवान, नए कपड़े और पारिवारिक मिलन के हर पल को कैमरे में कैद किया जा रहा है। तस्वीरें तुरंत सोशल मीडिया पर साझा हो जाती हैं और दूर बैठे लोग भी इन खुशियों से जुड़ जाते हैं।
लेकिन इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। कई बार उत्सव को महसूस करने से ज्यादा उसे कैमरे में कैद करने और सोशल मीडिया पर साझा करने की चिंता हावी हो जाती है। ऐसे में जरूरी है कि यादें बनाने की कोशिश में हम उन पलों को जीना न भूल जाएं।
उपहारों में बदली पसंद, सोच में आया नया बदलाव
गोवर्धन पूजा पर पशुधन का शृंगार, गांवों में सामूहिक उत्सव
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर ग्रामीण अंचलों में उत्सव का एक अलग ही रंग दिखाई देता है। पशुपालक अपने पशुधन यानी गायों और बैलों को सजाते हैं। उनके शृंगार के बाद सामूहिक रूप से गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दौरान आतिशबाजी भी होती है और पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है। खेती-किसानी और पशुपालन से जुड़े ग्रामीण समाज में गाय और बैल केवल पशु नहीं, बल्कि आजीविका और जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए गोवर्धन पूजा उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी बनती है।
दीपावली पर उपहार देने की परंपरा पुरानी है, लेकिन उपहारों की पसंद समय के साथ बदल रही है। पहले मिठाई के डिब्बे, सूखे मेवे, कपड़े और घरेलू उपयोग की वस्तुएं प्रमुख होती थीं। अब इनके साथ गिफ्ट हैम्पर, व्यक्तिगत नाम या संदेश वाले उपहार, सजावटी वस्तुएं, पौधे और उपयोगी डिजिटल गैजेट भी पसंद किए जा रहे हैं।
कॉरपोरेट गिफ्टिंग से लेकर परिवार और मित्रों के बीच उपहारों के आदान-प्रदान तक में नई पसंद दिखाई दे रही है। हालांकि, उपहार की कीमत से ज्यादा उसमें जुड़ी भारोवना का महत्व आज भी कायम है।
रोशनी के साथ जिम्मेदारी का अहसास भी जरूरी
बदलती दीपावली में पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता भी एक नया पहलू बनकर उभरी है। मिट्टी के दीयों का इस्तेमाल, स्थानीय कारीगरों से सजावटी सामान खरीदना, प्लास्टिक की सजावट से बचना और कम प्रदूषण वाले उत्सव को बढ़ावा देना जैसी सोच को जगह मिल रही है।
कई लोग तेज आवाज और धुएं वाले पटाखों के बजाय रोशनी, सजावट और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ आधुनिकता नहीं, बल्कि उत्सव को अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बनाने की दिशा भी है।
अंदाज नया, लेकिन दीपावली का भाव वही
समय के साथ दीपावली मनाने के तरीके बदलना स्वाभाविक है। हाथों से बनी सजावट की जगह तैयार सामान ने ली है, बाजार के साथ ऑनलाइन खरीदारी जुड़ गई है और शुभकामना कार्ड की जगह डिजिटल संदेशों ने ले ली है। रसोई में पारंपरिक पकवानों के साथ ऑनलाइन मंगाए गए व्यंजन भी शामिल हो गए हैं।
लेकिन इन बदलावों के बावजूद दीपावली की असली पहचान आज भी वही है। घर में जलता एक दीपक, पूजा के समय परिवार का एक साथ बैठना, बड़ों का आशीर्वाद, बच्चों की खुशियां, मिठाई की मिठास और अपनों के साथ बिताए कुछ यादगार पल।
तकनीक ने त्योहार को सुविधाजनक बनाया है, बाजार ने विकल्प बढ़ाए हैं और सोशल मीडिया ने खुशियों को साझा करने का दायरा बड़ा किया है। फिर भी दीपावली की असली रोशनी किसी स्क्रीन या बिजली की झालर में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में बसती है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं।
कह सकते हैं कि दीपावली अब सिर्फ दीयों से नहीं, डिजिटल स्क्रीन से भी जगमगा रही है। लेकिन उसकी आत्मा आज भी उसी मिट्टी के दीये में बसती है, जिसकी लौ हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देती है।
दीपावली : त्योहार वही, अंदाज नया
मिट्टी के दीयों से डिजिटल रोशनी तक बदली उत्सव की तस्वीर, परंपराओं में तकनीक का तड़का, फिर भी अपनों के साथ का सुख आज भी सबसे खास
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