इटारसी।
इटारसी के बस स्टैंड का विवाद अब केवल बसों के संचालन और यातायात व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक फैसले की जिद, जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा, व्यापारियों के हित और आम जनता की परेशानी के बीच उलझता जा रहा है। स्टेशन रोड स्थित पुराने बस स्टैंड पर पिक एंड ड्रॉप की सुविधा बहाल करने की मांग को लेकर अब बस ऑपरेटरों के साथ व्यापारी संगठन भी खुलकर मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। दूसरी ओर, प्रशासन और जनप्रतिनिधि अपने फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे।
नतीजा यह है कि बसें चौथे दिन भी सड़कों से गायब रहीं और सबसे ज्यादा परेशानी उन यात्रियों को उठानी पड़ रही है, जिनके पास निजी साधन नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थी, मजदूर, किसान और छोटे व्यापारी ऑटो के भरोसे हैं। आरोप हैं कि इस मजबूरी का फायदा उठाकर ऑटो चालक प्रति सवारी 50 से 100 रुपए तक वसूल रहे हैं। नगर पालिका द्वारा स्टेशन से नए बस स्टैंड तक 20 रुपए किराया निर्धारित करने के बावजूद मनमानी की शिकायतें सामने आ रही हैं।
अब व्यापारियों ने भी खोला मोर्चा
बस स्टैंड विवाद में अब संयुक्त व्यापार महासंघ ने भी हस्तक्षेप तेज कर दिया है। महासंघ के प्रतिनिधिमंडल ने जिला परिवहन अधिकारी से मुलाकात कर स्टेशन रोड स्थित पुराने बस स्टैंड को पूरी तरह बंद रखने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। इसके बाद राज्यसभा सांसद माया नारोलिया को ज्ञापन सौंपकर जनहित में हस्तक्षेप की अपील की गई।
महासंघ का तर्क है कि पुरानी इटारसी में बस स्टैंड संचालित करने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्टेशन रोड स्थित पुराने बस स्टैंड की उपयोगिता ही खत्म कर दी जाए। यहां कम से कम पिक एंड ड्रॉप की सुविधा तो जारी रहनी चाहिए, ताकि यात्रियों के साथ बाजार और व्यापारिक गतिविधियों को भी राहत मिल सके।
महासंघ अध्यक्ष दीपक हरिनारायण अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि शुक्रवार से बाजार में हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। मांग पूरी नहीं होने पर बाजार बंद करने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है। यानी अब तक बस ऑपरेटरों और राजनीतिक दलों के बीच चल रहा विवाद व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक पहुंच गया है।
2 नवंबर तक का अल्टीमेटम, नर्मदा में जल सत्याग्रह की चेतावनी
इधर, कांग्रेस सेवादल यंग ब्रिगेड के प्रदेशाध्यक्ष गजानंद तिवारी ने प्रशासन को 2 नवंबर तक का अल्टीमेटम दिया है। उनकी चेतावनी है कि निर्धारित समय तक स्टेशन रोड बस स्टैंड पर पिक एंड ड्रॉप की सुविधा बहाल नहीं हुई तो नर्मदा नदी के जलप्रवाह के बीच जल सत्याग्रह किया जाएगा।
विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा की मौजूदगी में हुई बैठक बेनतीजा रहने के बाद बस ऑपरेटर पुराने बस स्टैंड पर धरने पर बैठे हैं। ऑपरेटरों का कहना है कि नया बस स्टैंड शहर से करीब ढाई से तीन किलोमीटर दूर है और वहां यात्रियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
दूसरी ओर विधायक का रुख स्पष्ट है। उनका कहना है कि तीन महीने बाद समीक्षा बैठक में परिस्थितियों का आकलन किया जाएगा। तब तक बसों का संचालन नए बस स्टैंड से ही होगा।
जिस अव्यवस्था को खत्म करने के लिए बस स्टैंड बंद किया, वही सड़क पर लौट आई!
पुराने बस स्टैंड को बंद करने के पीछे यातायात व्यवस्था सुधारने और सड़क पर होने वाली अव्यवस्था रोकने का तर्क दिया गया था। लेकिन मौजूदा स्थिति इस दावे पर ही सवाल खड़े कर रही है।
रेलवे ओवरब्रिज और पुराने बस स्टैंड के आसपास ऑटो चालकों ने सड़क के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। यहां अघोषित ऑटो स्टैंड जैसी स्थिति बन गई है। यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाकर मनमाना किराया वसूलने की शिकायतें भी हैं।
सवाल यह है कि यदि सड़क पर अतिक्रमण और अव्यवस्थित वाहन संचालन ही समस्या थी तो उस पर नियंत्रण करने के बजाय बस स्टैंड बंद करना ही एकमात्र समाधान क्यों माना गया? क्या यातायात नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की नहीं है?
एसडीएम नीलेश शर्मा के अनुसार, बसों की हड़ताल से प्रभावित विद्यार्थियों के लिए शहर के तीनों शासकीय कॉलेजों के माध्यम से वैकल्पिक बसों की व्यवस्था करने की तैयारी की जा रही है। यह कदम जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आम यात्रियों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की परेशानी का कोई स्थायी समाधान निकाला गया है?
दो बस स्टैंड की मांग पर आखिर आपत्ति क्यों?
शहर में आम लोगों के बीच एक सवाल लगातार चर्चा में है। जब कोई पुरानी इटारसी के बस स्टैंड को बंद कराने की मांग नहीं कर रहा और दोनों बस स्टैंड के संचालन की बात कही जा रही है, तो फिर स्टेशन रोड पर सीमित पिक एंड ड्रॉप सुविधा बहाल करने में इतनी अड़चन क्यों है?
व्यापारियों और विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि पुरानी इटारसी में बसों का संचालन जारी रहे, लेकिन रेलवे स्टेशन रोड पर यात्रियों को चढ़ाने-उतारने की सुविधा भी मिलनी चाहिए। इससे दोनों क्षेत्रों के हितों में संतुलन बनाया जा सकता है।
लेकिन यह मांग अभी तक किसी सर्वमान्य समाधान तक नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में लोगों के बीच यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि कहीं यह मामला यातायात प्रबंधन से आगे बढ़कर प्रतिष्ठा की लड़ाई तो नहीं बन गया है?
भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच एक और चर्चा शहर में जोर पकड़ रही है। रेलवे स्टेशन के गेट और आवागमन व्यवस्था में भविष्य में संभावित बदलावों के चलते स्टेशन रोड क्षेत्र की व्यावसायिक उपयोगिता बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुराने बस स्टैंड की जमीन और आसपास के क्षेत्र के भविष्य के व्यावसायिक उपयोग को लेकर भी कोई सोच काम कर रही है? क्या वहां दुकानों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की संभावनाएं इस फैसले के पीछे कोई भूमिका निभा रही हैं?
फिलहाल इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं है और न ही किसी संभावित व्यावसायिक योजना को इस फैसले का कारण बताया गया है। लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि जनहित के फैसले को लेकर अनावश्यक संदेह न पनपे।
सवाल अब फैसले का नहीं, उसके औचित्य का है
बस स्टैंड विवाद में हर पक्ष अपने तर्क दे रहा है, लेकिन आम जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है। बसें कब चलेंगी? विद्यार्थियों को नियमित परिवहन कब मिलेगा? यात्रियों को स्टेशन से शहर तक पहुंचने के लिए मनमाना किराया क्यों देना पड़ेगा? और बाजार को हो रहे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
व्यवस्था सुधारने के नाम पर लिया गया फैसला यदि नई अव्यवस्था पैदा कर रहा है तो उसकी समीक्षा प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं होनी चाहिए।
व्यापारी हस्ताक्षर अभियान की तैयारी में हैं, बस ऑपरेटर हड़ताल पर हैं, कांग्रेस जल सत्याग्रह की चेतावनी दे रही है और प्रशासन वैकल्पिक इंतजामों में जुटा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आम नागरिक है, जिसकी परेशानी लगातार बढ़ रही है।
शहर को बस स्टैंड पर सत्ता और सियासत की लड़ाई नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें दोनों बस स्टैंड भी चलें और यात्रियों को भी परेशानी न हो। आखिर जनहित के फैसले में जनता ही सबसे पीछे क्यों छूट रही है?
बस स्टैंड पर जिद किसकी, कीमत चुका रही जनता!
बस ऑपरेटरों की हड़ताल चौथे दिन भी जारी, अब व्यापारी भी मैदान में; पिक एंड ड्रॉप के लिए 2 नवंबर तक अल्टीमेटम, नर्मदा में जल सत्याग्रह की चेतावनी
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