इटारसी। इटारसी के बस स्टैंड का विवाद अब केवल बसों के पिक एंड ड्रॉप तक सीमित नहीं रह गया है। यह शहर के विकास, पुरानी इटारसी की पहचान, व्यापारियों के हित और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का रूप लेता जा रहा है। पुराने बस स्टैंड पर बसों के दो मिनट के ठहराव और पिक एंड ड्रॉप की मांग को लेकर बस ऑपरेटरों की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी है (खबर लिखे जाने तक तो)। मंगलवार को विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा, नगर पालिका अध्यक्ष पंकज चौरे और बस ऑपरेटरों के बीच हुई बातचीत भी बेनतीजा रही। विधायक ने तीन महीने बाद नई व्यवस्था की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर पिक एंड ड्रॉप की अनुमति पर विचार करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन ऑपरेटरों ने इसे स्वीकार नहीं किया। दूसरी तरफ विधायक ने स्पष्ट कर दिया कि बस स्टैंड अब नए स्थान से ही संचालित होगा और इस निर्णय से पीछे हटने का सवाल नहीं है। यानी फिलहाल दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोई राह नहीं निकल सकी है। इस टकराव के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यात्रियों की परेशानी दूर करने के लिए बीच का रास्ता कौन निकालेगा?

तीन महीने का इंतजार भी मंजूर नहीं, टकराव अपनी जगह कायम

विवाद सुलझाने के लिए हुई बातचीत में विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा ने बस ऑपरेटरों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे तीन महीने तक नए बस स्टैंड से ही बसों का संचालन करें। इस अवधि में व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी और आवश्यकता महसूस होने पर पुराने बस स्टैंड पर पिक एंड ड्रॉप की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन ऑपरेटर इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए। विधायक का तर्क है कि बस स्टैंड कहां संचालित होगा, यह तय करना बस ऑपरेटरों का अधिकार क्षेत्र नहीं है। यह सरकार और प्रशासन का विषय है। उन्होंने साफ कहा कि शहर के विस्तार और विकास के लिए बस स्टैंड को नए स्थान पर संचालित करने का निर्णय लिया गया है। विधायक के इस रुख से स्पष्ट है कि फिलहाल प्रशासनिक व्यवस्था बदलने के बजाय ऑपरेटरों से नई व्यवस्था स्वीकार करने की अपेक्षा की जा रही है। वहीं ऑपरेटर अपनी मांग पर कायम हैं। ऐसे में हड़ताल खत्म होने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे।

बस स्टैंड से शुरू हुआ विवाद, अब इटारसी बनाम पुरानी इटारसी की बहस

इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। शुरुआत पुराने बस स्टैंड पर बसों के पिक एंड ड्रॉप की सुविधा बहाल करने की मांग से हुई थी। कांग्रेस और कुछ व्यापारी संगठन इसके समर्थन में सामने आए। लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, पुरानी इटारसी की पहचान और हितों का सवाल भी इसमें जुड़ गया। इसके बाद दो बस स्टैंड संचालित करने की मांग जोर पकड़ने लगी। इटारसी के कुछ कांग्रेस और भाजपा समर्थक नेता तथा व्यापारी इस मांग के पक्ष में हैं। दूसरी ओर, पुरानी इटारसी के कुछ कांग्रेस नेता और पार्षद पुराने बस स्टैंड को वहीं बनाए रखने के समर्थन में ज्ञापन दे रहे हैं। इससे विवाद का राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। एक तरफ शहर के यातायात और विकास की दलील है, तो दूसरी तरफ पुरानी इटारसी के लोगों की सुविधा और स्थानीय पहचान का सवाल। सवाल यह है कि क्या बस स्टैंड का फैसला केवल यातायात व्यवस्था के आधार पर होगा या शहर के अलग-अलग हिस्सों के राजनीतिक और व्यावसायिक हित भी इसे प्रभावित करेंगे?

कांग्रेस की लड़ाई में दिख रहे कई सुर

बस स्टैंड के मुद्दे पर कांग्रेस लगातार सक्रिय है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व में कांग्रेसजनों ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर पुराने बस स्टैंड को पुनः चालू करने और बसों के दो मिनट के ठहराव की मांग उठाई। कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन को बताया कि केसला, धोबीखापा, गाजपुर, रूपापुर, सोनतलाई, कोठा, रामपुर और गोर्रा सहित आसपास के अनेक गांवों के लोग इटारसी आने-जाने के लिए बसों पर निर्भर हैं। बस स्टैंड बंद होने से ग्रामीणों, विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों को परेशानी हो रही है। राजीव गांधी पंचायत राज संगठन के जिला अध्यक्ष हेमू कश्यप और रामपुर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राकेश मालवीय सहित अन्य कांग्रेसजन भी ज्ञापन देने पहुंचे। महिला कांग्रेस की जिला अध्यक्ष नेहा चावरे के नेतृत्व में छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों ने भी एसडीएम कार्यालय पहुंचकर अपनी समस्याएं रखीं। कांग्रेस की ओर से इसे यात्रियों और विद्यार्थियों की परेशानी से जोड़कर उठाया जा रहा है। वहीं, सोमवार को पुरानी इटारसी संघर्ष समिति ने भी पुरानी इटारसी में बस स्टैंड के समर्थन में ज्ञापन दिया। इसमें कांग्रेस के नेता भी शामिल रहे। इन गतिविधियों से साफ है कि बस स्टैंड का मुद्दा अलग-अलग समूहों के बीच राजनीतिक सक्रियता का केंद्र बन चुका है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से अलग-अलग समूहों में ज्ञापन देने की तस्वीर उसके आंदोलन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े करती है। शुरुआती दौर में जिस आक्रामकता के साथ बस स्टैंड का मुद्दा उठाया गया था, अब उसकी जगह ज्ञापन, अधिकारियों से चर्चा और बयानबाजी अधिक दिखाई दे रही है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि आंदोलन कमजोर पड़ गया है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि विरोध की शुरुआती धार फिलहाल पहले जैसी नजर नहीं आ रही।

विधायक का तर्क: शहर बढ़ेगा तो नए व्यापारिक केंद्र भी विकसित होंगे

विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा ने बस स्टैंड शिफ्ट करने के निर्णय का बचाव करते हुए शहर के विकास और विस्तार का तर्क दिया। उन्होंने उदाहरण दिया कि पहले शहर में जवाहर बाजार प्रमुख व्यापारिक केंद्र था, लेकिन समय के साथ लाइन एरिया, कॉन्वेंट स्कूल और अस्पताल के आसपास नए बाजार विकसित हुए। आबादी बढ़ने के साथ कॉलोनियों का विस्तार हुआ और नए क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियां बढ़ीं। विधायक के मुताबिक, बस स्टैंड को नए स्थान पर संचालित करने से भी भविष्य में रोजगार और व्यापार के नए अवसर विकसित हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बस स्टैंड शिफ्ट होने के बाद रेलवे स्टेशन रोड पर यातायात सुगम हुआ है और जाम की समस्या में राहत मिली है। आने वाले समय में मालगोदाम को भी रेलवे के माध्यम से शिफ्ट करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, शहर के विकास की यह दलील तभी व्यापक स्वीकार्यता हासिल कर सकती है, जब नए बस स्टैंड तक पहुंचने वाले यात्रियों की व्यावहारिक समस्याओं का भी समाधान हो।

प्रशासन के पास अधिकार, ऑपरेटरों पर कार्रवाई की चेतावनी

बैठक के दौरान बसों के रूट और परमिट को लेकर भी प्रशासनिक नियमों का हवाला दिया गया। विधायक ने कहा कि बसों के रूट और परमिट तय करना प्रशासन तथा आरटीओ का काम है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि नियमों के विपरीत बसों का संचालन होता है या वाहन अनफिट पाए जाते हैं, तो संबंधित ऑपरेटरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। आरटीओ द्वारा कार्रवाई नहीं किए जाने पर उच्च स्तर पर पत्राचार करने की बात भी कही गई। यह रुख बताता है कि जनप्रतिनिधि फिलहाल बस ऑपरेटरों की मांग के आगे झुकने के बजाय प्रशासनिक अधिकारों के जरिए नई व्यवस्था लागू रखने के पक्ष में हैं। लेकिन इस सख्ती के बीच यात्रियों के लिए नियमित बस सेवा बहाल करना भी उतना ही जरूरी है। हड़ताल लंबी खिंचती है तो उसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा, जिनके पास आवागमन के सीमित विकल्प हैं।

प्री-पेड ई-रिक्शा और ऑटो पॉइंट से मिलेगी राहत?

नए बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से शहर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए प्री-पेड ई-रिक्शा और ऑटो पॉइंट बनाने का प्रस्ताव भी सामने आया है। विधायक ने बताया कि नगर पालिका के माध्यम से यह व्यवस्था संचालित करने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा चालकों की बैठक बुलाई जाएगी। इसका उद्देश्य यात्रियों से तय किराए से अधिक वसूली की शिकायतों पर अंकुश लगाना है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो नए बस स्टैंड से शहर के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने में यात्रियों को राहत मिल सकती है। हालांकि, इसकी सफलता तय किराए, वाहनों की उपलब्धता और नियमित निगरानी पर निर्भर करेगी।

पुराने बस स्टैंड पर पार्किंग की योजना भी नहीं पकड़ सकी रफ्तार

नगर पालिका अध्यक्ष पंकज चौरे ने बताया कि पुराने बस स्टैंड परिसर में व्यापारियों के वाहनों की पार्किंग शुरू कराने के प्रयास अभी सफल नहीं हो पाए हैं। उनके अनुसार, व्यापारियों ने पार्किंग के लिए सहमति दी थी। सुरक्षा के लिए दो कर्मचारियों की तैनाती भी की गई, लेकिन इसके बावजूद व्यापारी वहां अपने वाहन पार्क करने नहीं पहुंच रहे हैं। नगर पालिका अध्यक्ष का कहना है कि पुराने बस स्टैंड पर पार्किंग शुरू होने से बाजार में ग्राहकों की आवाजाही बढ़ सकती है। प्रशासन इस संबंध में जागरूकता अभियान भी चला रहा है। हालांकि, पार्किंग की योजना का अपेक्षित परिणाम नहीं निकलना इस बात की ओर भी ध्यान दिलाता है कि केवल सुविधा उपलब्ध कराने की घोषणा पर्याप्त नहीं है। लोगों को उसका इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ व्यवस्था की व्यावहारिक उपयोगिता भी सुनिश्चित करनी होगी।

अब सवाल समाधान का, सियासत का नहीं

बस स्टैंड विवाद में फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। विधायक निर्णय वापस लेने के पक्ष में नहीं हैं, बस ऑपरेटर पुराने बस स्टैंड पर पिक एंड ड्रॉप की मांग छोड़ने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस यात्रियों की परेशानी और पुराने बस स्टैंड की बहाली का मुद्दा उठा रही है, जबकि पुरानी इटारसी के हितों को लेकर भी अलग से आवाजें उठ रही हैं। इस बीच तीन महीने बाद समीक्षा का प्रस्ताव भी गतिरोध तोड़ने में सफल नहीं हुआ। अब असली चुनौती यह है कि शहर के विकास और यात्रियों की सुविधा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या प्रशासन केवल नए बस स्टैंड से संचालन की व्यवस्था पर कायम रहेगा, या यात्रियों की परेशानी को देखते हुए कोई व्यावहारिक विकल्प भी सामने आएगा? फिलहाल बस स्टैंड पर फैसला जनप्रतिनिधियों और ऑपरेटरों के बीच अटका है। लेकिन इस विवाद का वास्तविक परिणाम इस बात से तय होगा कि आम यात्रियों, ग्रामीणों, विद्यार्थियों और छोटे व्यापारियों की मुश्किलें कितनी कम होती हैं।