नर्मदापुरम/भोपाल 
सूबे में इन दिनों मौसम भले बदल रहा हो, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में तबादलों की गर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही। शनिवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दुबई रवाना होने से पहले 11 आईएएस अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदल दी गईं। राज्य प्रशासनिक सेवा के आधा दर्जन अधिकारियों को भी नई जगह भेज दिया गया।
अब साहब लोग नई कुर्सियां संभाल ही रहे हैं कि गलियारों में अगली सूची की सरसराहट सुनाई देने लगी है। चर्चा है कि 8 से 10 कलेक्टरों की कुर्सियों पर भी सरकार की नजर है।
और मामला सिर्फ कलेक्टरों तक सीमित रहे, ऐसा भी नहीं लग रहा। कुछ जिलों के एसपी और संभागीय स्तर पर आईजी-डीआईजी भी संभावित फेरबदल की चर्चा में हैं। वजह वही पुरानी—जहां प्रशासन और स्थानीय सियासत की पटरी बराबर नहीं बैठ रही, वहां सरकार शायद नया ड्राइवर तलाश रही है।
नर्मदापुरम की कुर्सी पर भी निगाहें?
अब आते हैं अपने नर्मदापुरम पर।यहां कलेक्टर सौरभ मिश्रा का नाम भी संभावित तबादलों की चर्चाओं में शामिल बताया जा रहा है।वैसे उन्हें जिले मे आए  अभी सिर्फ छह  महीने ही हूएं हैं , उनके नाम आने का कारण  प्रशासनिक हलकों में इसकी एक वजह हाल में जिले में हुआ किसान आंदोलन बताया जा रहा है।
आंदोलन के दौरान प्रशासन की हैंडलिंग को लेकर जो सवाल उठे, क्या उनका हिसाब-किताब अब प्रशासनिक फेरबदल की भाषा में होगा? फिलहाल इसका जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन नाम चर्चा में आ गया है, इतना जरूर है।और सियासत में कई बार आदेश आने से पहले ही नामों की आवाजाही शुरू हो जाती है।
कुर्सी से ज्यादा महत्वपूर्ण है तालमेल!
तबादलों की इस कवायद में एक दिलचस्प बात यह भी है कि अब सिर्फ अधिकारी का कामकाज ही पैमाना नहीं माना जा रहा। स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ तालमेल भी प्रशासनिक समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।जहां तालमेल ठीक है, वहां कुर्सी मजबूत मानी जा रही है। जहां संवाद में दरार है, वहां फाइल कितनी मोटी है और अधिकारी कितना पुराना—दोनों बातें गौण हो सकती हैं।
यानी संदेश साफ है—सरकार को सिर्फ काम करने वाला अधिकारी नहीं, सरकार के साथ कदम मिलाकर चलने वाला प्रशासन भी चाहिए।
दुबई से वापसी का इंतजार
मुख्यमंत्री के तीन दिवसीय दुबई दौरे से लौटने के बाद अब निगाहें भोपाल पर रहेंगी। शनिवार की सूची को अगर पहली घंटी माना जाए तो अगली घंटी कब बजेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
क्योंकि चर्चा सिर्फ इतनी नहीं है कि कौन जाएगा।
चर्चा यह भी है कि कौन आएगा... और किसे लाकर किस जिले का समीकरण साधा जाएगा।
दस जिलों के नाम, दस अलग-अलग वजहें
गलियारों में जिन जिलों के कलेक्टरों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें दतिया, गुना, ग्वालियर, नर्मदापुरम, राजगढ़, इंदौर, शाजापुर, नीमच, हरदा और भिंड शामिल बताए जा रहे हैं।
कहीं कार्यकाल लंबा हो गया है, कहीं राजनीतिक घटनाक्रम ने ध्यान खींचा है और कहीं प्रशासनिक प्रदर्शन पर सवाल उठे हैं।
दतिया में उपचुनाव का समीकरण है तो नर्मदापुरम और भिंड में किसान आंदोलन की चर्चा। कुछ जगह ढाई साल से अधिक की पदस्थापना है तो कहीं निगमायुक्त से कलेक्टर तक का पुराना अनुभव भी चर्चा का हिस्सा है।
यानी हर जिले की कहानी अलग है, लेकिन फाइल एक ही टेबल पर घूम रही है—तबादला टेबल।
और पुलिस भी शायद दूर नहीं
कलेक्टरों की सूची के साथ पुलिस महकमे की भी चर्चा है। कुछ एसपी और संभागीय स्तर के आईजी-डीआईजी को लेकर भी समीकरणों का आकलन होने की बात कही जा रही है।
अब जिन साहबों का स्थानीय सत्ता से संवाद मधुर है, वे फिलहाल चैन की सांस ले सकते हैं। और जिनके यहां फोन की घंटी बजने के बाद पहले यह सोचना पड़ता है कि “उधर से कौन बोल रहा है—जनप्रतिनिधि या भोपाल?”, उनके लिए आने वाले दिन थोड़े बेचैनी भरे हो सकते हैं।
फिलहाल आदेश नहीं, सिर्फ आहट
बहरहाल, अभी कलेक्टरों के संभावित तबादलों को लेकर कोई आधिकारिक सूची सामने नहीं आई है। इसलिए गलियारों की चर्चा को आदेश मान लेना जल्दबाजी होगी।
लेकिन शनिवार की प्रशासनिक सर्जरी ने इतना जरूर बता दिया है कि सरकार ने तबादलों की कैंची म्यान में नहीं रखी है।
अब मुख्यमंत्री दुबई से लौटेंगे और उसके बाद देखना यह होगा कि अगली सूची में कैंची किस कुर्सी पर चलती है।
नर्मदापुरम की कुर्सी भी इस इंतजार में है कि गलियारों की फुसफुसाहट आदेश तक पहुंचती है या फिर फाइल किसी और मोड़ पर जाकर ठंडी पड़ जाती है।