इटारसी।भोपाल// सरकार ने वर्ष 2026 को कृषि वर्ष घोषित किया है। खेती को लाभ का धंधा बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के दावे भी लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों से अलग नजर आ रही है। रबी सीजन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। नर्मदापुरम संभाग के कई क्षेत्रों में किसान चना और सरसों की बुवाई में जुट गए हैं, वहीं गेहूं की बोवनी के लिए खेत तैयार किए जा रहे हैं। दूसरी ओर प्रदेश का रबी कार्ययोजना (रबी प्लान) अब तक पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है।
विडंबना यह है कि जिस समय किसानों को यह सलाह मिलनी चाहिए कि कम बारिश और उपलब्ध सिंचाई संसाधनों के बीच कौन-सी फसल लेना उनके लिए फायदेमंद रहेगा, उस समय कृषि विभाग की संभागवार बैठकों का दौर ही पूरा नहीं हुआ है। सागर, शहडोल और रीवा संभाग में कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) की बैठकें नवंबर के पहले सप्ताह में प्रस्तावित हैं। यानी खेतों में बुवाई शुरू होने के बाद सरकारी स्तर पर फसलवार जरूरतों और संसाधनों की समीक्षा होगी।
नर्मदापुरम में भी सवाल, किसान अपने स्तर पर बना रहे रणनीति
नर्मदापुरम जिले की खेती में गेहूं और चना प्रमुख रबी फसलें हैं। इसके अलावा मूंग, सरसों और अन्य फसलों का भी अपना महत्व है। इस बार कम बारिश के कारण किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल सिंचाई के पानी को लेकर है। जिन किसानों के पास पर्याप्त पानी उपलब्ध है, वे गेहूं की तैयारी कर रहे हैं, जबकि सीमित सिंचाई वाले किसान चना और सरसों जैसी अपेक्षाकृत कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं।
खेती का फैसला यहां केवल बाजार भाव देखकर नहीं होता। खेत में नमी, पलेवा के लिए पानी, आगे मिलने वाली सिंचाई और खाद-बीज की उपलब्धता भी फसल का चयन तय करती है। ऐसे में समय रहते कृषि विभाग की ओर से फसलवार सलाह और संसाधनों की उपलब्धता का स्पष्ट रोडमैप मिलना जरूरी है।
बैठकें ही अधूरी तो किसानों तक कैसे पहुंचेगी सलाह?
रबी और खरीफ सीजन से पहले कृषि विभाग को दो अलग-अलग कार्ययोजनाएं तैयार करनी होती हैं। इनमें संभावित बोवनी क्षेत्र, फसलों की जरूरत के अनुसार खाद-बीज और कीटनाशकों की उपलब्धता, सिंचाई संसाधनों की स्थिति तथा किसानों को दी जाने वाली तकनीकी सलाह शामिल होती है।
इसके लिए कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में संभागवार बैठकें होती हैं। संबंधित विभागों के अधिकारी स्थानीय परिस्थितियों और किसानों की जरूरतों की जानकारी देते हैं। इसके आधार पर प्रदेश की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाता है।
लेकिन इस बार बैठकों में देरी ने कृषि विभाग की तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब रबी की बोवनी शुरू हो चुकी है, तब कार्ययोजना को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चलना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
खाद के आंकड़े और किसानों की जमीनी परेशानी
सरकारी स्तर पर प्रदेश में अब तक 4.50 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 2 लाख मीट्रिक टन डीएपी और 1 लाख मीट्रिक टन एनपीके खाद के वितरण के दावे किए जा रहे हैं। दूसरी ओर किसानों की शिकायत है कि जरूरत के अनुपात में खाद नहीं मिल रहा है। बीज का इंतजाम भी कई किसान अपने स्तर पर कर रहे हैं। बाजार में महंगी दरों पर कृषि सामग्री खरीदने की मजबूरी उनकी लागत बढ़ा रही है।
नर्मदापुरम संभाग में भी किसानों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सहकारी समितियों के माध्यम से खाद की आपूर्ति मांग के अनुरूप हो पाती है या नहीं। खासकर बोवनी के समय खाद की उपलब्धता में कमी आने पर किसानों को निजी बाजार का सहारा लेना पड़ता है।
पानी की कमी बदल सकती है फसल का गणित
इस बार कम बारिश का असर रबी के रकबे और फसल चक्र पर भी पड़ सकता है। जिन किसानों के पास सीमित सिंचाई संसाधन हैं, वे अधिक पानी मांगने वाली फसलों से दूरी बना सकते हैं। चना और सरसों जैसी फसलों को प्राथमिकता देने की स्थिति बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, फसल की लागत और संभावित उत्पादन का आकलन उपलब्ध पानी के आधार पर करना जरूरी है। केवल बोवनी का रकबा बढ़ाना कृषि की सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। किसानों को यह भरोसा भी चाहिए कि फसल के पूरे चक्र में जरूरत के अनुसार पानी, खाद और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध रहेगा।
कृषि वर्ष में सवाल यही...
सरकार कृषि वर्ष मना रही है, लेकिन कृषि विभाग की कार्ययोजना समय पर पूरी नहीं हो रही। नर्मदापुरम जैसे कृषि प्रधान संभाग में किसान मौसम और पानी की उपलब्धता के हिसाब से अपने स्तर पर फैसले लेने को मजबूर हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब किसान खेत में उतर चुका है, तब सरकारी प्लानिंग कागजों और बैठकों से बाहर कब निकलेगी?
कृषि वर्ष की सार्थकता तभी है, जब किसानों को समय पर सलाह, उचित मूल्य पर खाद-बीज और सिंचाई की उपलब्धता सुनिश्चित हो। अन्यथा कृषि वर्ष का उत्सव सरकारी आयोजनों तक ही सीमित रह जाएगा।