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विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

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ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता...

इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

नागदेव ने रोका रास्ता… बोले- आस्था मन में रखिए……

पचमढ़ी। दुर्गम पहाड़ी रास्ता… चारों तरफ घना जंगल… नागद्वारी गुफा और देवस्थल के दर्शन की आस में आगे बढ़ता श्रद्धालु। तभी रास्ते में सामने आता है एक विशाल नागदेव। श्रद्धालु ठिठक जाता है। नागदेव उससे सवाल करते हैं—“दर्शन करने आए हो, लेकिन क्या इस जंगल की जिम्मेदारी भी समझते हो?”यहीं से शुरू होती है सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की वह कहानी, जो इस बार नागद्वारी मेले में श्रद्धालुओं को आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रही है।नागद्वारी मेला शुरू हो चुका है और 17 अगस्त, नाग पंचमी तक चलेगा। करीब 10 दिन चलने वाले इस मेले को प्रशासन ने इस बार ग्रीन और प्लास्टिक मुक्त मेला बनाने की थीम रखी है। इसी अभियान को प्रभावी बनाने के लिए सतपुड़ा टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने एक रचनात्मक एनिमेटेड वीडियो जारी किया है। इसमें नागदेव स्वयं श्रद्धालुओं को जंगल की अहमियत समझाते नजर आते हैं। “यह रास्ता सिर्फ आपका नहीं, वन्यजीवों का भी घर है”वीडियो में श्रद्धालु नागद्वारी की कठिन यात्रा पर निकलता है। रास्ते में उसकी मुलाकात नागदेव से होती है। बातचीत में नागदेव बताते हैं कि जिस जंगल से होकर श्रद्धालु गुजर रहे हैं, वह केवल तीर्थयात्रियों का रास्ता नहीं है। यह असंख्य जीव-जंतुओं और वन्यप्राणियों का घर भी है।श्रद्धालु जब आस्था के नाम पर जंगल में कपड़े, प्रसाद सामग्री या दूसरी चीजें छोड़ने की बात करता है, तो नागदेव उसे समझाते हैं—श्रद्धा मन में होती है, जंगल में कपड़े या प्लास्टिक छोड़ने में नहीं।संदेश साफ है—भगवान का आशीर्वाद लेने आए हैं तो उनके बनाए जंगल का सम्मान करना भी सीखिए। बोतल, रैपर और पुराने कपड़े बन रहे संकटमेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से प्लास्टिक बोतलें, रैपर, पॉलीथिन, दोने-पत्तल और पुराने कपड़ों का कचरा जंगल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यही वजह है कि प्रशासन प्रवेश मार्गों पर वाहनों की जांच और प्लास्टिक सामग्री पर नियंत्रण की तैयारी कर रहा है।एसटीआर का वीडियो श्रद्धालुओं को यह भी संदेश देता है कि जो सामान लेकर जंगल में आए हैं, उसे वापस भी साथ लेकर जाएं। कचरा रास्ते में छोड़ने के बजाय अपने बैग में रखें और बाहर निकलकर निर्धारित स्थान पर ही डालें। श्रद्धालु ने उठाया कचरा, नागदेव ने दिया आशीर्वादकहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा तब आता है जब श्रद्धालु नागदेव की बात समझता है। वह रास्ते में बिखरा प्लास्टिक और कचरा खुद उठाकर अपने बैग में भर लेता है और जंगल को साफ रखने का संकल्प लेता है।उसकी इस पहल से प्रसन्न होकर नागदेव पंचमुखी अवतार में उसे आशीर्वाद देते हैं।वीडियो का संदेश भी इसी दृश्य के साथ सामने आता है—प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची तीर्थयात्रा है। आस्था भी रहे, जंगल भी बचेनागद्वारी यात्रा सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सतपुड़ा के संवेदनशील जंगलों से होकर गुजरने वाली यात्रा भी है। इसलिए एसटीआर प्रबंधन श्रद्धालुओं से अपील कर रहा है कि वे प्लास्टिक बोतल, पॉलीथिन, रैपर, पुराने कपड़े और अन्य कचरा जंगल में न छोड़ें।प्रशासन की कोशिश है कि इस बार श्रद्धालु दर्शन की पुण्य स्मृति लेकर लौटें, लेकिन जंगल के हिस्से में अपना कचरा छोड़कर नहीं।नागदेव का संदेश सीधा है—भगवान को प्रसाद चढ़ाइए, जंगल को कचरा नहीं।

नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का ‘पीढ़ी परिवर्तन’ प्लान,  युवा चेहरों पर दांव;  पुराने नेताओं की बढ़ सकती है मुश्किल

मध्य प्रदेश में 2027 के निकाय चुनाव की तैयारियां तेज, पार्षद से लेकर महापौर तक नए चेहरों को मौका देने की रणनीति; गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों पर भी नजर भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन भाजपा ने इसकी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। संगठन स्तर पर चल रहे पीढ़ी परिवर्तन के अभियान का असर अब नगरीय निकायों में भी दिखाई देने की तैयारी है। पार्टी इस बार बड़ी संख्या में नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारने के साथ साफ छवि वाले गैर राजनीतिक लोगों को भी मौका देने की रणनीति पर काम कर रही है।प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में होने वाले चुनाव में महापौर के साथ नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की तैयारी है। यानी मतदाता सीधे अध्यक्ष और महापौर का चुनाव करेंगे। यही बदलाव भाजपा की रणनीति को महत्वपूर्ण बना रहा है, क्योंकि सीधे चुनाव में संगठन के बजाय उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, छवि और स्थानीय स्वीकार्यता भी निर्णायक होगी। 30 से 50 साल के नेताओं पर फोकस भाजपा की रणनीति में उम्र भी महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकती है। पार्टी स्तर पर यह विचार चल रहा है कि पार्षद पद पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के नेताओं को अधिक अवसर दिया जाए। वहीं अध्यक्ष और महापौर पद के लिए अधिकतम उम्र करीब 60 वर्ष रखने की गाइडलाइन पर विचार है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में अपवाद की संभावना भी रहेगी।इसका सीधा असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जो वर्षों से निकाय की राजनीति में सक्रिय हैं और लगातार टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। पार्टी संगठन में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति को अब स्थानीय सरकार तक ले जाने की तैयारी कर रही है। गैर राजनीतिक चेहरों पर भी नजर भाजपा की रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में अवसर देना है। सामाजिक कार्य, व्यापार, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय लेकिन साफ छवि रखने वाले लोगों को निकाय चुनाव में उतारने पर विचार हो सकता है।पार्टी का आकलन है कि ऐसे चेहरों से स्थानीय स्तर पर नई स्वीकार्यता बनाई जा सकती है। साथ ही लंबे समय से चले आ रहे गुटीय समीकरणों और आपसी खींचतान से भी संगठन को बाहर निकलने का मौका मिलेगा। पुराने अध्यक्षों की एंटी-इनकमबेंसी चुनौती 2022 में हुए निकाय चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर उभरा असंतोष रहा। उस चुनाव में महापौर को छोड़कर नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुए थे। पार्षदों द्वारा चुने गए कई अध्यक्षों के खिलाफ बाद में असंतोष और गुटबाजी सामने आई।2024-25 में शिवपुरी और देवरी समेत करीब 100 निकायों में अध्यक्षों के खिलाफ पार्षदों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी। सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव की समय-सीमा को दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष किया। साथ ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी पार्षदों के समर्थन की सीमा भी दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई कर दी गई।इस बदलाव से निकायों में चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक टकराव की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हुई। 1000 से ज्यादा एल्डरमैन से साधे असंतुष्ट सरकार द्वारा नगर निगमों और नगर पालिकाओं में 1,000 से अधिक एल्डरमैन की नियुक्ति को भी निकाय चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इनके जरिए लंबे समय से उपेक्षित या असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने के साथ सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा। वार्डों का पुनरीक्षण, मतदाता सूची भी तैयार निकाय चुनाव की प्रशासनिक तैयारियां भी आगे बढ़ चुकी हैं। नगरीय विकास विभाग वार्डों का पुनरीक्षण कर चुका है और राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का प्रकाशन कर चुका है। ऐसे में भाजपा संगठन अब संभावित उम्मीदवारों की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ का आकलन करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।हालांकि पार्टी के भीतर निकाय चुनाव को आगे बढ़ाने की संभावना पर भी चर्चा है। अंतिम कार्यक्रम और चुनाव की समय-सीमा पर तस्वीर बाद में साफ होगी।फिलहाल संकेत साफ हैं—भाजपा निकाय चुनाव को सिर्फ सत्ता की पुनरावृत्ति का चुनाव नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रही है। अगर उम्र और नए चेहरे की रणनीति लागू हुई तो कई पुराने दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट बचाने की ही होगी।

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