मध्य प्रदेश में 2027 के निकाय चुनाव की तैयारियां तेज, पार्षद से लेकर महापौर तक नए चेहरों को मौका देने की रणनीति; गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों पर भी नजर
भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन भाजपा ने इसकी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। संगठन स्तर पर चल रहे पीढ़ी परिवर्तन के अभियान का असर अब नगरीय निकायों में भी दिखाई देने की तैयारी है। पार्टी इस बार बड़ी संख्या में नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारने के साथ साफ छवि वाले गैर राजनीतिक लोगों को भी मौका देने की रणनीति पर काम कर रही है।
प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में होने वाले चुनाव में महापौर के साथ नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की तैयारी है। यानी मतदाता सीधे अध्यक्ष और महापौर का चुनाव करेंगे। यही बदलाव भाजपा की रणनीति को महत्वपूर्ण बना रहा है, क्योंकि सीधे चुनाव में संगठन के बजाय उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, छवि और स्थानीय स्वीकार्यता भी निर्णायक होगी।
30 से 50 साल के नेताओं पर फोकस
भाजपा की रणनीति में उम्र भी महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकती है। पार्टी स्तर पर यह विचार चल रहा है कि पार्षद पद पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के नेताओं को अधिक अवसर दिया जाए। वहीं अध्यक्ष और महापौर पद के लिए अधिकतम उम्र करीब 60 वर्ष रखने की गाइडलाइन पर विचार है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में अपवाद की संभावना भी रहेगी।
इसका सीधा असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जो वर्षों से निकाय की राजनीति में सक्रिय हैं और लगातार टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। पार्टी संगठन में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति को अब स्थानीय सरकार तक ले जाने की तैयारी कर रही है।
गैर राजनीतिक चेहरों पर भी नजर
भाजपा की रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में अवसर देना है। सामाजिक कार्य, व्यापार, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय लेकिन साफ छवि रखने वाले लोगों को निकाय चुनाव में उतारने पर विचार हो सकता है।
पार्टी का आकलन है कि ऐसे चेहरों से स्थानीय स्तर पर नई स्वीकार्यता बनाई जा सकती है। साथ ही लंबे समय से चले आ रहे गुटीय समीकरणों और आपसी खींचतान से भी संगठन को बाहर निकलने का मौका मिलेगा।
पुराने अध्यक्षों की एंटी-इनकमबेंसी चुनौती
2022 में हुए निकाय चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर उभरा असंतोष रहा। उस चुनाव में महापौर को छोड़कर नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुए थे। पार्षदों द्वारा चुने गए कई अध्यक्षों के खिलाफ बाद में असंतोष और गुटबाजी सामने आई।
2024-25 में शिवपुरी और देवरी समेत करीब 100 निकायों में अध्यक्षों के खिलाफ पार्षदों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी। सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव की समय-सीमा को दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष किया। साथ ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी पार्षदों के समर्थन की सीमा भी दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई कर दी गई।
इस बदलाव से निकायों में चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक टकराव की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हुई।
1000 से ज्यादा एल्डरमैन से साधे असंतुष्ट
सरकार द्वारा नगर निगमों और नगर पालिकाओं में 1,000 से अधिक एल्डरमैन की नियुक्ति को भी निकाय चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इनके जरिए लंबे समय से उपेक्षित या असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने के साथ सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा।
वार्डों का पुनरीक्षण, मतदाता सूची भी तैयार
निकाय चुनाव की प्रशासनिक तैयारियां भी आगे बढ़ चुकी हैं। नगरीय विकास विभाग वार्डों का पुनरीक्षण कर चुका है और राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का प्रकाशन कर चुका है। ऐसे में भाजपा संगठन अब संभावित उम्मीदवारों की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ का आकलन करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
हालांकि पार्टी के भीतर निकाय चुनाव को आगे बढ़ाने की संभावना पर भी चर्चा है। अंतिम कार्यक्रम और चुनाव की समय-सीमा पर तस्वीर बाद में साफ होगी।
फिलहाल संकेत साफ हैं—भाजपा निकाय चुनाव को सिर्फ सत्ता की पुनरावृत्ति का चुनाव नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रही है। अगर उम्र और नए चेहरे की रणनीति लागू हुई तो कई पुराने दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट बचाने की ही होगी।





