गेंहू की फसल पर “मामा” का प्रकोप “.

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नर्मदापुरम//
कभी पंजाब हरियाणा में गेंहू की फसल के लिए समस्या बनी खरपतवार जिसे वहां ‘ गेहूं  का मामा ‘ कहा जाता है, अब मध्य प्रदेश में भी अपने पैर पसार चुका है और उसमें तेजी आ रही है…. आई सी ए आर की रिपोर्ट के मुताबिक नर्मदापुरम , नरसिंहपुर,बैतूल, विदिशा, सीहोर, कटनी, जबलपुर  सहित कई जिलों में इसके प्रकोप  को देखा जा रहा है ।   नर्मदापुरम में इस खरपतवार को गुल्ली-डंडा कहा जाता है…. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय  पर इसको नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह फसल  को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
इसे पहचाना मुश्किल होता है
फैलारिस माइनर वैज्ञानिक नाम वाली यह खरपतवार गेहूं जैसी दिखती है, इसलिए इसे पहचाना मुश्किल होता है और गेंहू के पौधों के पोषक तत्वों  और पानी को चुराकर जड़ों को  खोखला कर गेहू की वृद्धि को पर असर डालती है. दाने में भराव कम हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार समय पर नियंत्रण नहीं होने पर यह खरपतवार गेहूं के उत्पादन में 30- 35फीसदी तक असर डाल सकता है।
शुरुआती अवस्था में यह बिल्कुल गेहूं की तरह दिखता है, इसमें गेहूं जैसी बाली भी निकलती है, लेकिन बालियों में कांटे नहीं होते और कॉलर वाला हिस्सा हल्के गुलाबी रंग का होता है।
जानकार किसानों का कहना है कि यह खरपतवार उस जमीन पर ज्यादा मात्रा में होती है जहां जल भराव होता है, या जमीन नमी पकड़ कर चलती है। नमी वाले खेतों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है, वैसे क्षेत्र में इसका प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।

इसके नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाएं (जैसे फिनोक्सीडॉन ,क्लोडिनाफॉप, मेट्रिब्यूज़िन) और फसल चक्र अपनाना ज़रूरी है। 

इसे ‘मामा’ और  गुल्ली डंडा क्यों कहते हैं ?
इस खरपतवार के नामों की कहानी भी दिलचस्प है। इस खरपतवार को  बहरूपिया कहा जा सकता है बिल्कुल गेहूं जैसी दिखने वाली यह खरपतवार गेहूं की फसल में छिप जाता है  जिससे किसान इसे पहचान नहीं पाते और अंत में यह फसल को नुकसान पहुँचाता है, ग्रामीण  अंचलों में मामा और भांजे का जो रिश्ता होता है, वह बहुत ही अटूट और  दोस्ताना सा होता । खरपतवार और गेहूं में काफी समानता होती है।ठीक वैसे ही जैसे मामा कभी-कभी अपने भांजों और बच्चों को शरारत से परेशान करते हैं यह गेहूं की फसल को परेशान करती है।इसीलिए इसे गेहूं का मामा बुलाने लगे हैं.और यह नाम प्रचलन में भी आ गया है.
कुछ जगह पर इसे गुल्ली डंडा भी बोला जाता है. इसकी वजह ये है, इसकी जो बनावट होती है,  इसका तना सीधा, पतला और सख्त होता है. दिखने में बिल्कुल डंडे की तरह होता है, तो वहीं इसका ऊपर का जो हिस्सा है, जो बीच का गुच्छा बनता है, वो छोटा और बेलनाकार होता है, जो कि बिल्कुल गुल्ली की तरह दिखता है. इसीलिए इसे गुल्ली डंडा के नाम से भी ग्रामीण क्षेत्रों में जानते हैं. वैसे इसे भंडूसी, कनकी, कैनरी ग्रास भी बोला जाता है।
कहां से आई यह खरपतवार !
इस खरपतवार का ओरिजन उत्तरी अफ्रीका यूरोप के देशों में माना जाता है। जानकारों के अनुसार हरित क्रांति के पहले देश में अनाज की कमी थी, उस समय अमेरिका मेक्सिको से हमारे यहां अनाज आयात किया गया था, तब यह गेहूं के साथ आ चुका था।

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