भोपाल । मध्यप्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह एक बार फिर लंबी पदयात्रा के जरिए अपना राजनीतिक संदेश जनता तक पहुंचाने जा रहे हैं। इस बार रास्ता नर्मदा परिक्रमा से अलग है—महाकाल की नगरी उज्जैन से रामलला की नगरी अयोध्या तक। पूर्व मुख्यमंत्री 20 अक्टूबर, विजयादशमी के दिन ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ शुरू करेंगे। करीब 930 से 950 किलोमीटर की इस यात्रा में वे रोज लगभग 15 किलोमीटर पैदल चलने की बात कह चुके हैं।
सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह है कि यात्रा में कांग्रेस का झंडा और पोस्टर नहीं होगा। दिग्विजय इसे जनजागरण यात्रा बता रहे हैं और इसका ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ रखा गया है। यात्रा में तिरंगे के साथ पांच रंगों वाली धर्मध्वजा भी रहेगी।
सनातन के मुद्दे पर कांग्रेस का अलग नैरेटिव?
दिग्विजय सिंह ने यात्रा को किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति के खिलाफ नहीं बताया है। लेकिन इसके मुद्दे सीधे उस राजनीतिक विमर्श से जुड़ते हैं, जिसमें भाजपा लंबे समय से राम, हिंदुत्व और सनातन को अपनी राजनीति के प्रमुख विषयों में रखती रही है।
दिग्विजय अब इसी धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में ‘वोट चोरी’ और ‘चंदा-चढ़ावा’ जैसे मुद्दे जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि वोट से जुड़ी पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए और धार्मिक स्थलों के चढ़ावे की पारदर्शिता आस्था के लिए जरूरी है।
यानी यात्रा का राजनीतिक संदेश दो समानांतर मुद्दों पर खड़ा किया जा रहा है—लोकतांत्रिक संस्थाओं में पारदर्शिता और धार्मिक आस्था से जुड़े संसाधनों में पारदर्शिता।
कांग्रेस का झंडा नहीं, फिर भी राजनीति से दूरी कितनी?
यात्रा को गैर-राजनीतिक बताया जा रहा है, लेकिन दिग्विजय सिंह ने इसके ऐलान के साथ ही केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राजनीतिक आरोप भी लगाए हैं। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल उठाए और ईवीएम/चुनावी प्रक्रिया पर भी अपनी आपत्तियां दोहराईं। बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग को लेकर डिजिटल पिटीशन भी जारी की गई है।
यही वजह है कि यात्रा का स्वरूप धार्मिक और सामाजिक जनजागरण का रखा गया है, लेकिन इसके मुद्दों में चुनाव, लोकतंत्र, चंदा, धार्मिक संस्थाएं और सत्ता सभी शामिल हैं।
महाकाल से रामलला तक—रास्ते में मध्यप्रदेश की सियासत
यात्रा उज्जैन के महाकाल मंदिर से शुरू होकर तराना, शाजापुर, सारंगपुर, राजगढ़, चाचौड़ा, आरोन, अशोकनगर, चंदेरी और ओरछा होते हुए उत्तर प्रदेश में प्रवेश करेगी। इसके बाद चिरगांव, उरई, कालपी, कानपुर देहात, लखनऊ देहात और बाराबंकी होते हुए अयोध्या पहुंचेगी।
इस रूट की खासियत यह है कि यात्रा धार्मिक केंद्रों के साथ-साथ मध्यप्रदेश के ग्रामीण और अर्धशहरी राजनीतिक इलाकों से भी गुजरेगी। ऐसे में यात्रा के दौरान स्थानीय मुद्दे, किसान, रोजगार, सामाजिक समीकरण और धार्मिक आस्था—सभी राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन सकते हैं।
नर्मदा परिक्रमा के बाद अब ‘शिवधाम से रामधाम’
दिग्विजय सिंह इससे पहले 3,200 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। अब उन्होंने अपनी नई यात्रा को ‘शिवधाम से रामधाम’ का स्वरूप दिया है। मीडिया रिपोर्टों में उनकी पिछली पदयात्रा और इस यात्रा के बीच राजनीतिक समानताओं को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
हालांकि इस बार उनका फोकस केवल धार्मिक यात्रा पर नहीं है। वोट की पारदर्शिता, चंदे की जवाबदेही और धार्मिक आस्था की रक्षा को एक ही राजनीतिक-सामाजिक फ्रेम में रखकर दिग्विजय अपना संदेश आगे बढ़ा रहे हैं।
अब नजर भाजपा की प्रतिक्रिया पर
दिग्विजय की यात्रा की घोषणा के बाद मध्यप्रदेश में इसका राजनीतिक जवाब भी सामने आने लगा है। यात्रा के धार्मिक स्वरूप और उसके राजनीतिक मुद्दों को लेकर भाजपा की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में इस अभियान की सियासी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी। यात्रा के दौरान भाजपा और कांग्रेस के बीच ‘सनातन किसका, नैरेटिव किसका’ जैसी बहस तेज होने की संभावना है—हालांकि इसका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव यात्रा के दौरान सामने आने वाली प्रतिक्रियाओं और जनभागीदारी पर निर्भर करेगा।
महाकाल से अयोध्या तक दिग्विजय की पदयात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस का एक वरिष्ठ नेता सनातन और राम की आस्था से जुड़े प्रतीकों को अपने राजनीतिक संवाद में रखते हुए भाजपा से अलग जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल उठा रहा है। अब देखना यह होगा कि यह यात्रा केवल दिग्विजय सिंह का अभियान बनकर रहती है या कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनती है।
महाकाल से रामलला तक दिग्विजय का ‘सनातन दांव’, कांग्रेस के झंडे के बिना होगी 950 किमी पदयात्रा
‘वोट चोरी’ से ‘चंदा-चढ़ावा’ तक मुद्दे साथ, विजयादशमी पर उज्जैन से शुरुआत; सवाल—क्या सनातन के नैरेटिव पर कांग्रेस अपनी अलग जमीन तलाश रही है?
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