नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में दलबदल का खेल थमने के बजाय अपना भूगोल बदलता नजर आ रहा है,एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2021 के बीच कांग्रेस से सबसे ज्यादा सांसद-विधायक दूसरे दलों में गए, जबकि भाजपा दल बदलकर आने वाले नेताओं की सबसे बड़ी मंजिल बनी,अब 2022 से जुलाई 2026 तक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दलबदल की नई कहानी में नागालैंड और पश्चिम बंगाल सबसे आगे हैं।
ADR की 2014-2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में 500 सांसदों-विधायकों के दल बदलने का विश्लेषण किया गया। इनमें 177 यानी 35 प्रतिशत सांसद-विधायक कांग्रेस छोड़कर दूसरे दलों में गए। दूसरी तरफ, दल बदलकर भाजपा में पहुंचने वाले सांसद-विधायकों की संख्या 173 यानी 35 प्रतिशत रही। उम्मीदवारों के स्तर पर भी कांग्रेस सबसे ज्यादा नुकसान में रही—222 उम्मीदवारों ने कांग्रेस छोड़ी, जबकि 253 दल बदलकर भाजपा में पहुंचे।
यानी 2014 के बाद की सियासत में एक तरफ कांग्रेस के नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने का सिलसिला दिखा, तो दूसरी तरफ भाजपा दलबदल कर आने वाले नेताओं के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक ठिकाना बनकर उभरी। कांग्रेस ने भी इस अवधि में 61 सांसद-विधायकों और 115 उम्मीदवारों को दूसरे दलों से अपने साथ जोड़ा था।
अब दलबदल का नया केंद्र नागालैंड और बंगाल
ताजा ADR रिपोर्ट ने 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने वाले 111 मौजूदा सांसदों-विधायकों का विश्लेषण किया है। इनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सदस्य और 78 विधायक शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा मामले नागालैंड में 32 और पश्चिम बंगाल में 20 दर्ज हुए। दोनों राज्यों को मिलाकर कुल मामलों का करीब 47 प्रतिशत हिस्सा बनता है।
नागालैंड के 32 मामलों के पीछे NDPP और NPF के बीच राजनीतिक पुनर्संयोजन की बड़ी भूमिका रही। वहीं पश्चिम बंगाल के सभी 20 मामले लोकसभा सांसदों से जुड़े हैं। तेलंगाना में 9, गोवा और पंजाब में 8-8, महाराष्ट्र और मेघालय में 6-6 तथा मणिपुर में 5 मामले सामने आए।
कौन छोड़ रहा है पार्टी, किसे मिल रहा नया ठिकाना?
ताजा आंकड़ों में NDPP से चुने गए 25 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली, जबकि तृणमूल कांग्रेस से 20 और कांग्रेस से 19 जनप्रतिनिधियों ने दल बदला। इसके अलावा बीआरएस से 9, आप और एनसीपी से 7-7 तथा उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना से 6 जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने के मामले दर्ज हुए।
दूसरी तरफ, पार्टी बदलने वालों के लिए NPF में 32, भाजपा में 29 और Nationalist Citizens Party of India में 20 जनप्रतिनिधि पहुंचे। कांग्रेस को 9, शिवसेना को 8 और एनपीपी को 6 जनप्रतिनिधि मिले। ADR के मुताबिक NPF, भाजपा और Nationalist Citizens Party of India ने मिलकर 111 में से 81 जनप्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ा।
गोवा से महाराष्ट्र तक बदली तस्वीर
दलबदल की कहानी केवल पूर्वोत्तर तक सीमित नहीं है। गोवा में कांग्रेस के आठ विधायक भाजपा में गए। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट से चुने गए छह लोकसभा सांसद बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में चले गए। तेलंगाना में पार्टी बदलने के सभी नौ मामले बीआरएस के विधायकों से जुड़े रहे। पंजाब में छह राज्यसभा सदस्यों और दो विधायकों समेत आठ मामले दर्ज हुए।
आठ साल बनाम चार साल: आंकड़े क्या कहते हैं?
2014-2021: कांग्रेस से 177 सांसद-विधायक बाहर हुए और 173 दलबदल कर भाजपा में पहुंचे।
2022-2026: 111 निर्वाचित सांसद-विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदली।
इन आंकड़ों से इतना साफ है कि दल बदलना भारतीय राजनीति का अपवाद नहीं, लगातार दर्ज हो रहा राजनीतिक घटनाक्रम है। फर्क सिर्फ इतना है कि पिछले दौर में कांग्रेस से बड़े पैमाने पर नेताओं के निकलने और भाजपा में उनके पहुंचने का आंकड़ा प्रमुख था, जबकि ताजा दौर में नागालैंड, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में क्षेत्रीय राजनीतिक पुनर्संयोजन ज्यादा दिखाई देता है।
ADR ने यह भी स्पष्ट किया है कि 2022-26 का 111 मामलों का आंकड़ा उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है और व्यवस्थित आधिकारिक डेटा की कमी के कारण इसे पूर्णतः सटीक (exhaustive) सूची नहीं माना जा सकता।