इटारसी/शहर की बिगड़ी यातायात व्यवस्था और अतिक्रमण को लेकर करीब दो सप्ताह पहले जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सत्ताधारी दल के नेताओं की बैठक हुई थी,बैठक में सख्त तेवर दिखे, व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए और लगा कि अब शहर की सड़कों को राहत मिलेगी। नगरपालिका ने भी दोचार दिन अभियान चलाकर जुर्माने किए और कार्रवाई का दम दिखाया,लेकिन कुछ ही दिनों में सख्ती की हवा निकल गई,स्थानीय अंदाज में कहें तो मामला अब ‘बैठ गुल्ला पानी पी’ हो गया है। शहर फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया है जहां सड़क पर फल के ठेले हैं, भीड़ के बीच लोडिंग-अनलोडिंग है और प्रतिबंध के बावजूद भारी वाहन शहर की सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
बोर्ड नगरपालिका का, ठेले सड़क पर
सबसे बड़ा उदाहरण फल के ठेलों का है। नगरपालिका ने बाजार में ठेले लगाने पर रोक के बोर्ड लगाए हैं। कार्रवाई की, जुर्माने किए और ठेलों को हटाने के लिए दल भी बनाया। लेकिन बोर्ड अपनी जगह है और उसके सामने ठेले भी अपनी जगह।
जयस्तंभ चौक से द्वारिकाधीश बड़ा मंदिर रोड तक बाजार की स्थिति इसका उदाहरण है। जिस सड़क को व्यवस्थित करने के लिए बार-बार अभियान चलाए गए, वहीं अब फिर फल के ठेले नजर आ रहे हैं।
सवाल यह है कि अगर कार्रवाई के बाद भी वही ठेले उसी सड़क पर लौट आते हैं तो फिर अभियान किसके लिए और कितने दिन के लिए?
24 लाख के 62 चबूतरे भी काम नहीं आए
फल विक्रेताओं को सड़क से हटाकर व्यवस्थित करने के लिए नगरपालिका ने महर्षि वाल्मीकि फल मंडी बनाई थी। करीब 24 लाख रुपये खर्च कर 62 शेडयुक्त चबूतरे बनाए गए। वर्ष 2017-18 में फल विक्रेताओं को यहां जगह भी आवंटित की गई।
लेकिन सात साल में स्थिति ऐसी रही कि इन चबूतरों पर सात दिन भी व्यवस्थित रूप से फल की दुकानें नहीं लग सकीं। बाद में फल विक्रेताओं से बातचीत के बाद नगरपालिका ने इन्हीं चबूतरों को तुड़वा दिया।
लॉटरी से जगह आवंटित हुई, नंबरिंग के पोस्टर लगाए गए, चेतावनी बोर्ड लगे—लेकिन सड़क के ठेले अपनी जगह से नहीं हटे।
यानी व्यवस्था बनाने के लिए खर्च भी हुआ, प्रयोग भी हुए, अभियान भी चले और कार्रवाई भी हुई... मगर नतीजा वही शून्य।
कर्मचारी को धमकी, एफआईआर भी... फिर भी ठेले बेखौफ
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कितनी चुनौतीपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नगरपालिका के अतिक्रमण दल में शामिल कर्मचारी के साथ विवाद तक हो चुका है।
करीब हफ्ते भर पहले शहर के मुख्य बाजार में सड़क पर फल का ठेला लगाने से रोकने को लेकर नगर पालिका कर्मचारी और फल विक्रेता के बीच विवाद हो गया था। आरोप है कि निर्धारित स्थान पर ठेला लगाने की समझाइश देने पर फल विक्रेता ने नगरपालिका कर्मचारी को सरेआम चाकू मारने की धमकी दी। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।
जानकारी के अनुसार, नगरपालिका के अतिक्रमण दल में शामिल कर्मचारी सिद्धार्थ बाजार क्षेत्र में कार्रवाई के लिए पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने सड़क के बीच फल का ठेला लगाए फल विक्रेता को ठेला हटाकर निर्धारित स्थान पर दुकान लगाने के लिए कहा। इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हो गया।
बताया गया कि विवाद बढ़ने पर फलविक्रेता ने कर्मचारी को चाकू मारने की धमकी दी, घटना के बाद मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें विवाद के दौरान धमकी दिए जाने की बात सामने आ रही है।
घटना की जानकारी नगरपालिका प्रशासन तक पहुंचने के बाद कार्रवाई की गई। फल विक्रेता का ठेला सड़क से हटाया गया और उसे जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। मामले में पुलिस कार्रवाई की भी बात सामने आई है।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में कर्मचारियों की सुरक्षा पर सवाल
मुख्य बाजार की सड़कों को अतिक्रमण मुक्त और यातायात को व्यवस्थित करने के लिए नगरपालिका द्वारा समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन कार्रवाई के दौरान कर्मचारियों के साथ विवाद और धमकी की घटनाएं प्रशासन के लिए चुनौती बन रही हैं।
ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि नगरपालिका के कर्मचारी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करते हैं तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और प्रशासनिक सहयोग कैसे मिले, ताकि कार्रवाई केवल अभियान तक सीमित न रहे और बाजार की यातायात व्यवस्था स्थायी रूप से सुधर सके।तीन हजार का जुर्माना मंजूर, लेकिन सड़क पर असर कितना?
नगरपालिका परिषद के सम्मेलन में 11 नवंबर को बाजार की सड़कों पर फल-सब्जी की दुकान लगाने वालों से तीन हजार रुपये तक जुर्माना वसूलने का प्रस्ताव मंजूर किया गया था। सामान जब्त करने का भी प्रावधान रखा गया।
इसके बावजूद बाजार की तस्वीर बताती है कि नियम और कार्रवाई के बीच बड़ा फासला है।
जुर्माना बढ़ाने से ज्यादा जरूरी शायद यह देखना है कि कार्रवाई लगातार हो भी रही है या नहीं।
भारी वाहनों पर रोक भी ‘बोर्ड तक’ सीमित?
अतिक्रमण के साथ शहर की यातायात व्यवस्था का दूसरा बड़ा संकट भारी वाहनों का है। प्रशासन ने सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक बाजार और शहरी क्षेत्र में भारी वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया है।
लेकिन रेलवे स्टेशन रोड, न्यूयार्ड, डोलरिया मार्ग, न्यास कॉलोनी, सूरजगंज, मालवीयगंज और अन्य भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में ट्रक, डंपर और मिनी लोडिंग वाहन दिन में भी आते-जाते दिखाई दे रहे हैं।
स्थिति यह है कि प्रतिबंध की सूचना देने वाले बोर्ड तक कई जगह गायब हो चुके हैं और जहां बोर्ड मौजूद हैं, वहां वाहन चालक बेखौफ नजर आते हैं।
बाजार के बीच ट्रक खराब हुआ तो खुल गई पूरी व्यवस्था
हाल ही में बाजार क्षेत्र में बीच सड़क एक भारी वाहन खराब हो गया। इसके बाद यातायात प्रभावित हुआ और लोगों को परेशानी उठानी पड़ी।
यह घटना सिर्फ एक खराब वाहन की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर भी है जिसमें जिस वाहन का प्रवेश ही प्रतिबंधित है, वह दिन के समय शहर के बीच पहुंच जाता है।
लोडिंग-अनलोडिंग के लिए भी सड़क ही ‘गोदाम’
शहर में ट्रांसपोर्ट नगर नहीं होने का असर भी सड़कों पर दिखाई देता है। मुख्य बाजार और लाइन क्षेत्र में दिन के समय माल की लोडिंग-अनलोडिंग होती है। इससे पहले से भीड़भाड़ वाली सड़कों की चौड़ाई और कम हो जाती है।
खेड़ा क्षेत्र में हाईवे के दोनों ओर भारी वाहनों की कतारें लगने से दुर्घटना का खतरा बना रहता है।
प्रस्तावित मास्टर प्लान में ट्रांसपोर्ट नगर का प्रावधान होने की बात कही जाती है, लेकिन जब तक वह जमीन पर नहीं आता, तब तक शहर की सड़कों पर ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का दबाव बना रहेगा।
बैठकें होती हैं, योजनाएं बनती हैं... अमल कहां है?
यातायात, पार्किंग, भारी वाहनों और अतिक्रमण को लेकर नगरपालिका, पुलिस प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कई बैठकें हो चुकी हैं। पार्किंग की योजनाओं पर चर्चा हुई। भारी वाहनों के लिए समय तय किया गया। अतिक्रमण हटाने के अभियान चले।
लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है—
बैठक के बाद कार्रवाई कितने दिन चली?
जिन नियमों पर सहमति बनी, उनका पालन कौन करा रहा है?
और अगर प्रतिबंध के बावजूद वाहन और ठेले सड़क पर हैं तो जिम्मेदारी किसकी है?
शहर को एक-दो दिन की सख्ती नहीं, लगातार और समान रूप से लागू होने वाली व्यवस्था चाहिए। वरना हर बार बैठक होगी, निर्देश होंगे, अभियान चलेगा और कुछ दिन बाद शहर फिर वहीं पहुंच जाएगा—जहां से अभियान शुरू हुआ था।यातायात सुधार की असली परीक्षा बैठक में नहीं, सड़क पर होती है।
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