इटारसी// कभी हर घर के आंगन में खड़ी साइकिल शहर की पहचान हुआ करती थी। स्कूल, दफ्तर, बाजार और रिश्तेदारों के घर तक का सफर इसी से तय होता था। फिर मोटरसाइकिल और कार ने रफ्तार बढ़ाई तो साइकिल सड़कों से गायब होने लगी। अब प्रदूषण, महंगे ईंधन, ट्रैफिक और बदलती जीवनशैली के बीच ई-साइकिल के रूप में दो पहियों की यह पुरानी साथी नए अवतार में वापसी की दस्तक दे रही है।
घंटी की आवाज से पहचाने जाते थे मोहल्ले
एक दौर था जब सुबह होते ही शहर की सड़कों पर साइकिलों की आवाजाही शुरू हो जाती थी। कहीं स्कूल जाते बच्चों की कतार होती थी तो कहीं दफ्तर पहुंचने की जल्दी में पैडल मारते कर्मचारी दिखाई देते थे। डाकिया चिट्ठियां बांटता था, दूधवाला घरों तक दूध पहुंचाता था और छोटे कारोबारी अपने सामान के साथ बाजार निकल पड़ते थे।
साइकिल केवल आने-जाने का साधन नहीं थी, वह आम आदमी की आजादी थी। न पेट्रोल की चिंता, न पार्किंग का झंझट और न ही रखरखाव पर बड़ा खर्च। हैंडल पर टंगा सब्जी का झोला, पीछे कैरियर पर बैठा बच्चा और आगे डंडे पर दोस्त को बैठाकर चलने का अपना ही आनंद था।
1960 से 1990 के दशक तक साइकिल भारतीय शहरों और कस्बों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रही। कई परिवारों के लिए पहली साइकिल खरीदना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था। नई साइकिल घर आती थी तो बच्चों के लिए वह किसी उत्सव जैसा अवसर होता था।
साइकिल से मोटरसाइकिल तक, बदल गया मध्यमवर्ग का सपना
समय के साथ शहरों का विस्तार हुआ। दूरियां बढ़ीं, कामकाज के तरीके बदले और लोगों की जरूरतें भी। मोटरसाइकिल ने कम समय में ज्यादा दूरी तय करने का विकल्प दिया। धीरे-धीरे यह मध्यमवर्ग की जरूरत और फिर सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई।
इसके बाद कारों की संख्या बढ़ी। परिवार के लिए दोपहिया से चारपहिया तक पहुंचना तरक्की का पैमाना माना जाने लगा। साइकिल धीरे-धीरे बच्चों, खिलाड़ियों और कुछ खास जरूरतों तक सीमित होती चली गई।
यह बदलाव सिर्फ सवारी का नहीं था, बल्कि सामाजिक सोच का भी था। कभी साइकिल खरीदना उपलब्धि थी, फिर मोटरसाइकिल खरीदना सपना बना और उसके बाद कार मध्यमवर्गीय परिवारों की आकांक्षा में शामिल हो गई।
शहर बड़े हुए, लेकिन साइकिल के लिए जगह छोटी पड़ गई
शहरों का विकास हुआ, सड़कें चौड़ी हुईं और वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी। लेकिन इस विकास में साइकिल सवारों की जरूरतों को पर्याप्त जगह नहीं मिली।
कई सड़कों पर साइकिल चलाना जोखिम भरा हो गया। सुरक्षित साइकिल लेन का अभाव, तेज रफ्तार वाहन और पार्किंग की समस्या ने लोगों को इस सवारी से दूर किया।
विडंबना यह है कि जिस साइकिल ने कभी शहरों को चलायमान बनाया था, उसी शहर में उसके लिए सुरक्षित रास्ते कम होते चले गए।
लॉकडाउन ने फिर याद दिलाई साइकिल की अहमियत
कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान परिवहन के साधन ठप होने पर साइकिल की उपयोगिता एक बार फिर सामने आई। प्रवासी मजदूरों के लंबे सफर और सीमित संसाधनों के बीच साइकिल कई लोगों के लिए सहारा बनी।
इस दौर ने यह भी याद दिलाया कि आधुनिक परिवहन व्यवस्था के बावजूद एक सस्ता, सरल और आत्मनिर्भर साधन कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
अब पैडल के साथ बैटरी की ताकत
बदलते समय के साथ साइकिल ने भी अपना स्वरूप बदला है। ई-साइकिल इसी बदलाव का नया उदाहरण है। इसमें लगी इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी पैडल चलाने में मदद करती हैं। इससे कम मेहनत में अपेक्षाकृत लंबी दूरी तय करना आसान हो जाता है।
कार्यालय जाने वाले लोग, विद्यार्थी और छोटी दूरी की यात्रा करने वाले नागरिक इसके संभावित उपयोगकर्ता हैं। पेट्रोल की जरूरत नहीं, शोर कम और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण भी नहीं। हालांकि इसकी कीमत, बैटरी की उम्र, चार्जिंग व्यवस्था और मरम्मत की उपलब्धता जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा।
ई-साइकिल यह संकेत देती है कि भविष्य की सवारी जरूरी नहीं कि पूरी तरह मोटर पर निर्भर हो। तकनीक और मानवीय श्रम का मेल भी शहरी परिवहन का अच्छा विकल्प बन सकता है।
छोटे शहरों के लिए आज भी बड़ी जरूरत
इटारसी जैसे छोटे और मध्यम आकार के शहरों में साइकिल की उपयोगिता आज भी बनी हुई है।बढ़ती भीड़, बेतरतीब होते यातायात और पार्किंग की समस्या के बीच बाजार, रेलवे स्टेशन, स्कूल, कार्यालय और आसपास की कॉलोनियों तक की छोटी दूरी के लिए साइकिल एक व्यावहारिक विकल्प हो सकती है।
लेकिन इसके लिए शहर की सड़कों पर साइकिल सवारों को सुरक्षित जगह देनी होगी। साइकिल लेन, बेहतर फुटपाथ, सुरक्षित पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन से संपर्क जैसी सुविधाएं विकसित करनी होंगी।
यदि छोटी दूरी के लिए लोग फिर साइकिल अपनाते हैं तो इससे ट्रैफिक का दबाव घटाने, ईंधन खर्च बचाने और शारीरिक सक्रियता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
सवाल साइकिल की वापसी का नहीं, शहर की सोच बदलने का है
साइकिल का पुराना दौर वापस नहीं आएगा, क्योंकि आज की जरूरतें और जीवनशैली बदल चुकी हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि साइकिल का भविष्य खत्म हो गया है।
शहरों को केवल कारों और मोटरसाइकिलों की सुविधा के हिसाब से विकसित करने के बजाय पैदल चलने वालों और साइकिल सवारों के लिए भी जगह बनानी होगी।
कभी साइकिल की घंटी शहर की सुबह का संगीत हुआ करती थी। आज ई-साइकिल की मोटर उस पुराने सफर को नई तकनीक के साथ आगे बढ़ा रही है।
सवाल यह नहीं कि शहर साइकिल के दौर में लौटेंगे या नहीं, सवाल यह है कि क्या आधुनिक शहर अपने विकास में दो पहियों वाली इस सस्ती, सहज और पर्यावरण के अनुकूल सवारी को फिर से जगह देने के लिए तैयार हैं?
कभी हर घर की शान थी साइकिल ,अब शहरों को फिर इसकी जरूरत ... !
मोटर साइकिल और कार के दौर में साइकिल वापसी की उम्मीद
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