इटारसी // कभी खुद को समझाने, कभी हौसला बढ़ाने और कभी बीती बातों का हिसाब करने के लिए हम अपने ही भीतर एक बातचीत करते रहते हैं। मनोविज्ञान की नजर में यह केवल आदत नहीं, बल्कि विचारों को समझने और भावनाओं को संभालने का एक उपयोगी तरीका भी हो सकता है।
कभी ऐसा हुआ है कि किसी मुश्किल फैसले पर विचार करते हुए आपने खुद से पूछा हो—अब क्या करना चाहिए? किसी काम में गलती होने पर मन ही मन अपनी सफाई दी हो या किसी बड़ी चुनौती से पहले खुद को समझाया हो कि घबराने की जरूरत नहीं, सब ठीक हो जाएगा।
कई बार यह बातचीत मन के भीतर चलती रहती है, तो कभी हम अनजाने में शब्दों को होंठों तक ले आते हैं। कोई अकेले टहलते हुए खुद से बातें करता है, कोई गाड़ी चलाते समय दिनभर की घटनाओं को दोहराता है और कोई रात को बिस्तर पर लेटकर उन सवालों के जवाब तलाशता है, जो दिनभर उसे परेशान करते रहे।
दूसरों की नजर में यह अजीब व्यवहार हो सकता है, लेकिन खुद से बातचीत करना मानवीय सोच का सामान्य हिस्सा है। मनोविज्ञान में इसे सेल्फ-टॉक यानी आत्म-संवाद कहा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि कई बार दूसरों को समझाने से पहले हमें खुद को समझाना पड़ता है। और कई बार किसी समस्या का हल बाहर नहीं, बल्कि अपने ही विचारों को व्यवस्थित करने में छिपा होता है।
हर बातचीत के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का होना जरूरी नहीं
हम दूसरों से बातचीत करते हैं तो अपने विचार साझा करते हैं, सवाल पूछते हैं और जवाब सुनते हैं। लेकिन जब हम खुद से बात करते हैं, तब भी लगभग यही प्रक्रिया चल रही होती है। फर्क इतना है कि सवाल पूछने वाला और जवाब तलाशने वाला व्यक्ति एक ही होता है।
मसलन, नौकरी, कारोबार या परिवार से जुड़ा कोई फैसला लेना हो तो मन में कई तरह के विचार आते हैं। एक आवाज कहती है कि जोखिम उठाना चाहिए, दूसरी संभावित नुकसान की याद दिलाती है। जब हम इन विचारों को शब्द देते हैं, तो उलझन को समझना थोड़ा आसान हो सकता है।
यही वजह है कि कुछ लोग किसी महत्वपूर्ण बैठक से पहले अपनी बातों का अभ्यास करते हैं, कुछ कठिन काम शुरू करने से पहले खुद को निर्देश देते हैं और कुछ किसी घटना को दोबारा याद करके यह समझने की कोशिश करते हैं कि उनसे कहां चूक हुई।
फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी में प्रकाशित 2023 की एक समीक्षा में आत्म-संवाद के विभिन्न संभावित कार्यों पर चर्चा की गई। इनमें समस्या सुलझाना, आत्म-चिंतन, स्मृति से जुड़ी प्रक्रियाएं, भावनाओं की अभिव्यक्ति और व्यवहार को नियंत्रित करना शामिल हैं। हालांकि, इन सभी लाभों के प्रमाण समान रूप से मजबूत नहीं हैं और आत्म-संवाद का असर व्यक्ति तथा परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है।
खुद से कही गई बात हौसला भी बन सकती है, बोझ भी
आत्म-संवाद की असली ताकत केवल बोलने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि हम खुद से क्या कहते हैं।
कल्पना कीजिए कि किसी काम में आपसे गलती हो गई। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला, आप खुद से कहें—मुझसे कुछ ठीक नहीं होता, मैं हमेशा गलती करता हूं। दूसरा, आप यह स्वीकार करें कि इस बार काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ, लेकिन अगली बार इसे बेहतर करने की कोशिश की जा सकती है।
दोनों स्थितियों में गलती एक ही है, लेकिन उसके प्रति आपका नजरिया अलग है।
पहली तरह की बातचीत आपको अपनी कमियों के बारे में सोचते रहने के लिए मजबूर कर सकती है। दूसरी बातचीत गलती से सीखने और आगे की कार्रवाई तय करने में मदद कर सकती है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर समय सकारात्मक बातें करना जरूरी है। कभी-कभी अपनी निराशा, गुस्से या असफलता को स्वीकार करना भी जरूरी होता है। महत्वपूर्ण यह है कि आत्म-संवाद हमें स्थिति को समझने में मदद कर रहा है या हम उसी नकारात्मक विचार में बार-बार उलझते जा रहे हैं।
मन परेशान हो तो खुद को थोड़ा बाहर से देखिए
भावनाएं तीव्र होती हैं तो किसी घटना को निष्पक्ष नजरिए से देखना मुश्किल हो सकता है। गुस्से में कही गई बात, किसी करीबी का व्यवहार या काम में मिली निराशा लंबे समय तक दिमाग में घूमती रह सकती है।
ऐसे समय में खुद को थोड़ी दूरी से देखने का तरीका उपयोगी हो सकता है।
मसलन, खुद से यह पूछने के बजाय कि 'मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?', आप पूछ सकते हैं—'अगर मेरा कोई दोस्त इसी परिस्थिति में होता, तो मैं उसे क्या सलाह देता?'
या फिर अपने नाम का इस्तेमाल करते हुए खुद से सवाल कर सकते हैं—'सुधांशु, इस समय तुम्हारे सामने असल समस्या क्या है?'
2017 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि अपने अनुभवों पर विचार करते समय स्वयं को नाम से या प्रथम पुरुष से अलग भाषा में संबोधित करना कुछ परिस्थितियों में भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। शोधकर्ताओं ने इसके पीछे अपने अनुभव से मनोवैज्ञानिक दूरी बनाने की संभावित भूमिका पर विचार किया।
यह कोई जादुई तरीका नहीं है, लेकिन कभी-कभी अपने ही अनुभव को दूसरे नजरिए से देखने का अवसर जरूर दे सकता है।
अकेले रहना और अकेलापन महसूस करना अलग बातें हैं
आज की जिंदगी में लोगों के संपर्क के साधन बढ़े हैं, लेकिन मन की बात कहने के अवसर हमेशा उतने नहीं बढ़े। परिवार के बीच रहते हुए भी कई बार व्यक्ति अपनी चिंता किसी से साझा नहीं कर पाता। किसी को लगता है कि उसकी बात समझी नहीं जाएगी, तो कोई दूसरों को परेशान करने से बचने के लिए अपनी परेशानी अपने तक रखता है।
ऐसे में खुद से बातचीत अपने विचारों को पहचानने का एक माध्यम बन सकती है। व्यक्ति समझ सकता है कि उसे वास्तव में किस बात से परेशानी है, वह क्या चाहता है और किस चीज को लेकर आशंकित है।
हालांकि, आत्म-संवाद को मानवीय रिश्तों का विकल्प नहीं मानना चाहिए। खुद से बात करना उपयोगी हो सकता है, लेकिन हर समस्या को अकेले सुलझाना जरूरी नहीं। कई बार किसी भरोसेमंद व्यक्ति से खुलकर बातचीत करना ही सबसे बेहतर अगला कदम होता है।
हर समय खुद को समझाते रहना भी ठीक नहीं
खुद से बातचीत तब कम उपयोगी हो सकती है, जब वह एक ही चिंता, गलती या आशंका को बार-बार दोहराने लगे।
मान लीजिए, किसी बातचीत में आपसे कोई बात गलत निकल गई। घटना समाप्त हो चुकी है, लेकिन आप घंटों यही सोचते रहते हैं कि सामने वाले ने क्या सोचा होगा, आपको क्या कहना चाहिए था और आपने ऐसा क्यों कहा। इस प्रक्रिया में कोई नई समझ नहीं बनती, न ही कोई समाधान निकलता है। उलटे बेचैनी बढ़ती जाती है।
यह आत्म-चिंतन से आगे बढ़कर बार-बार उसी बात में उलझे रहने का रूप ले सकता है।
ऐसी स्थिति में खुद से एक सवाल पूछना उपयोगी हो सकता है—क्या मैं इस बारे में कुछ नया समझ रहा हूं या केवल वही बात दोहरा रहा हूं?
अगर कोई समाधान सामने आ रहा है, तो अगला कदम तय करें। यदि विचार लगातार घूम रहे हैं, तो उन्हें लिखना, थोड़ी देर के लिए ध्यान दूसरी गतिविधि पर लगाना या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना मददगार हो सकता है।
और यदि यह परेशानी लगातार बनी रहे तथा नींद, कामकाज या रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
खुद से बातचीत को बेहतर बनाने के पांच तरीके
1. सवाल पूछिए, खुद पर फैसला मत सुनाइए। 'मैं ऐसा क्यों हूं?' के बजाय पूछें—'इस स्थिति में मुझसे क्या गलती हुई और मैं क्या सीख सकता हूं?'
2. समस्या को छोटे हिस्सों में बांटिए। पूरे दिन के काम को लेकर परेशान होने के बजाय तय करें कि सबसे पहले कौन-सा काम पूरा करना है।
3. खुद को हकीकत के करीब रखिए। बिना आधार के यह मान लेना कि सब कुछ बिगड़ जाएगा, उतना ही नुकसानदेह हो सकता है जितना यह मान लेना कि कोई समस्या है ही नहीं।
4. अपनी भाषा पर ध्यान दीजिए। 'मैं कुछ नहीं कर सकता' की जगह कहें—'यह मुश्किल है, लेकिन मैं इसका एक हिस्सा अभी हल करने की कोशिश कर सकता हूं।'
5. सोचने के बाद कदम भी उठाइए। आत्म-संवाद का उद्देश्य केवल विचार करते रहना नहीं, बल्कि स्थिति को समझना और जरूरत पड़ने पर आगे बढ़ना भी है।
आखिर में...
हम अक्सर दूसरों की बात सुनने, उन्हें समझने और उनकी परेशानियों का हल खोजने में समय बिताते हैं। लेकिन अपने मन की बात सुनने के लिए हमेशा उतना समय नहीं निकालते।
खुद से बातचीत इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकती है। यह हमें अपनी प्राथमिकताओं, गलतियों, आशंकाओं और उम्मीदों को समझने का अवसर देती है।
लेकिन इस बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि हम खुद से कितनी देर बात करते हैं। सवाल यह है कि उस बातचीत के बाद हम अपने बारे में और अपनी परिस्थिति के बारे में कितना बेहतर समझ पाते हैं।
क्योंकि खुद से बात करना तभी सार्थक है, जब वह हमें अपने ही खिलाफ खड़ा करने के बजाय खुद को समझने और जिंदगी को थोड़ा बेहतर ढंग से संभालने में मदद करे।
(कवर इमेज सेल्फ टॉक पेंटिंग बाय चेतना डिसूजा ,यूनाइटेड स्टेट सोर्स गूगल )
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