इटारसी //शहर को पहचानने के लिए सिर्फ उसकी सड़कें, इमारतें और बाजार देखना जरूरी नहीं। कभी उसकी आवाजों को भी सुनिए। सुबह मंदिर की घंटी, अजान की गूंज, गली में सब्जीवाले की पुकार, स्कूल की छुट्टी की घंटी और दूर से आती रेल की सीटी... इन सबके बीच एक शहर हर दिन जागता है, चलता है और अपनी कहानी कहता है। ये आवाजें इतनी आम हैं कि हम अक्सर इन पर ध्यान नहीं देते, लेकिन इनके बिना शहर की कल्पना करें तो महसूस होगा कि उसकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा कहीं खो गया है।

सुबह की शुरुआत और शहर का अपना संगीत

सुबह की पहली किरण के साथ जब मंदिर की घंटी सुनाई देती है और कहीं अजान की आवाज गूंजती है, तब शहर धीरे-धीरे जागने लगता है। घरों के दरवाजे खुलते हैं, सड़कों पर आवाजाही बढ़ती है और दिनचर्या अपनी रफ्तार पकड़ने लगती है।इसी बीच स्कूल की घंटी बच्चों को कक्षाओं में पहुंचने का संकेत देती है। गलियों से गुजरता सब्जीवाला अपनी जानी-पहचानी लय में आवाज लगाता है। कोई घर की खिड़की से उसे पुकारता है तो कोई दरवाजे पर आकर सब्जियों के भाव पूछने लगता है।यह कोई संगीत समारोह नहीं, लेकिन इन आवाजों में एक ऐसा संगीत जरूर है, जो शहर के जीवन से पैदा होता है। यहां हर आवाज का अपना समय है, अपना अर्थ है और लोगों की जिंदगी से जुड़ा एक रिश्ता है।

आवाजों में बसता है शहर का अपनापन

छोटे शहरों और पुराने मोहल्लों की एक खासियत होती है। यहां कई आवाजें अनजान नहीं होतीं। सब्जीवाले की पुकार सुनकर लोग पहचान लेते हैं कि कौन आया है। स्कूल की छुट्टी की घंटी से आसपास के घरों में बच्चों के लौटने का अंदाजा लग जाता है। मंदिर की घंटी और अजान दिन के अलग-अलग पलों का अहसास कराती हैं।कई बार किसी आवाज से जुड़ी यादें इतनी गहरी होती हैं कि बरसों बाद भी वह सुनाई दे तो पुराना समय आंखों के सामने आ जाता है।किसी को अपने बचपन का स्कूल याद आता है, किसी को घर के बाहर आवाज लगाता फेरीवाला और किसी को रेलवे स्टेशन पर किसी अपने को विदा करने का पल।यही वजह है कि शहर की आवाजें सिर्फ ध्वनियां नहीं हैं। वे लोगों की स्मृतियों, रिश्तों और साझा जीवन का हिस्सा हैं। शहर की पहचान उसके नक्शे पर दर्ज सड़कों से जितनी बनती है, उतनी ही उन आवाजों से भी, जो उन सड़कों पर हर दिन गूंजती हैं।

रेल की सीटी में छिपी हैं कितनी कहानियां !

रेलवे स्टेशन वाले शहरों में रेल की सीटी का अपना अलग ही महत्व होता है। किसी के लिए यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है, तो किसी के लिए सफर की शुरुआत का संकेत।रेल की सीटी के साथ किसी की विदाई जुड़ी होती है, किसी की घर वापसी और किसी के लिए नई जगह पर नई जिंदगी शुरू करने की उम्मीद।प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की चहल-पहल, उद्घोषणाओं की आवाज, कुलियों की पुकार और पटरियों पर दौड़ती रेल की गूंज मिलकर एक अलग ही संसार रचती हैं।इटारसी जैसे महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन वाले शहर में तो रेल की आवाजों का रिश्ता शहर की पहचान और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी से विशेष रूप से जुड़ता है। यहां रेल सिर्फ यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का माध्यम नहीं, बल्कि शहर की धड़कन और उसकी बाहरी दुनिया से जुड़ाव का भी प्रतीक है।रेल की सीटी सुनकर शायद ही कोई हर बार ठहरकर सोचता हो कि यह आवाज कितनी कहानियों को अपने भीतर समेटे हुए है। लेकिन शहर की स्मृतियों में ऐसी आवाजें लंबे समय तक जीवित रहती हैं।

आवाजों से शोर तक, कब बदल गया शहर?

शहर की हर आवाज मधुर हो, यह जरूरी नहीं। एक सीमा के बाद वही ध्वनियां परेशानी का कारण बन सकती हैं।बेवजह बजते हॉर्न, तेज आवाज में बजते लाउडस्पीकर, निर्माण कार्यों का शोर और देर रात तक गूंजता संगीत शहर की स्वाभाविक आवाजों को दबा देते हैं।यहां आवाज और शोर के बीच का अंतर समझना जरूरी है। आवाज शहर को जीवंत बनाती है, लेकिन अनियंत्रित शोर उसकी शांति छीन सकता है।जरूरत यह नहीं कि शहर को पूरी तरह खामोश कर दिया जाए। जरूरत इस बात की है कि उसकी स्वाभाविक ध्वनियां बनी रहें और अनावश्यक शोर पर नियंत्रण हो।वाहन चालक बेवजह हॉर्न न बजाएं, ध्वनि विस्तारक यंत्रों का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार हो और रिहायशी इलाकों में लोगों की शांति का ध्यान रखा जाए। यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि शहर में रहने वाले हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है।

डिजिटल दुनिया में गुम होती जा रही आसपास की आवाजें

आज मोबाइल फोन की घंटियां, लगातार आती सूचनाएं और डिजिटल दुनिया का शोर हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं। हम स्क्रीन पर आने वाले संदेशों पर तुरंत ध्यान देते हैं, लेकिन आसपास से गुजरती जिंदगी की आवाजों को कई बार अनसुना कर देते हैं।शहर भी बदल रहे हैं। पुराने मोहल्लों की जगह नई बस्तियां ले रही हैं, जीवन की रफ्तार बढ़ रही है और लोगों के पास ठहरकर आसपास को महसूस करने का समय कम होता जा रहा है।फिर भी कुछ आवाजें ऐसी हैं, जो समय के साथ हमारी स्मृतियों में जगह बनाए रखती हैं। स्कूल की छुट्टी की घंटी, सुबह की प्रार्थना, गली में फेरीवाले की पुकार और दूर से आती रेल की सीटी ऐसी ही आवाजें हैं।इनमें किसी शहर का बीता हुआ कल भी है और आज की जिंदगी भी।

शहर को सिर्फ देखिए मत, सुनिए भी!

किसी शहर की पहचान जानने के लिए उसके बाजारों, इमारतों और सड़कों को देखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसकी आवाजों को महसूस करना भी है।क्योंकि शहर केवल ईंट-पत्थर, सीमेंट और डामर से नहीं बनता। वह लोगों के मिलने-जुलने, रोजमर्रा की गतिविधियों, आस्थाओं, उम्मीदों और यादों से बनता है।मंदिर की घंटी, अजान, स्कूल की घंटी, सब्जीवाले की पुकार और रेल की सीटी इसी जीवन के अलग-अलग रंग हैं।कभी कुछ पल ठहरकर इन आवाजों को सुनिए। संभव है, आपको अपने शहर की वह पहचान सुनाई दे जाए, जिसे रोज देखते हुए भी आप महसूस नहीं कर पाते।आखिर, शहर की पहचान सिर्फ यह नहीं कि वह कैसा दिखाई देता है, बल्कि यह भी है कि वह सुनाई कैसा देता है।