मप्र में हर छह दिन में एक बाघ की मौत ! संरक्षण के दावों पर सवाल
बांधवगढ़ में मशहूर बाघिन डॉटी की मौत, 15-16 माह के दो शावक हुए मां से महरूम |अभयारण्यों के बाहर 20 बाघों की मौत, आपसी संघर्ष से लेकर करंट और शिकार तक बने खतरे
भोपाल /
मध्यप्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनकी मौतों का आंकड़ा भी चिंता बढ़ा रहा है। इस साल अब तक प्रदेश में 48 बाघों की मौत हो चुकी है। औसतन हर छह दिन में एक बाघ की जान जा रही है। इनमें से 20 बाघों की मौत बाघ अभयारण्यों के बाहर हुई है। सवाल यह है कि देश में बाघों की सर्वाधिक आबादी वाले मध्यप्रदेश में बाघ संरक्षण की चुनौती आखिर क्यों कम नहीं हो रही?
बाघों की मौतों के बीच बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक और दुखद खबर सामने आई है। यहां की प्रसिद्ध बाघिन डॉटी की नौ अक्टूबर को मौत हो गई। उसका शव मानपुर बफर क्षेत्र के मझखेता में मिला। वन विभाग के प्रारंभिक परीक्षण में मौत का कारण प्राकृतिक प्रतीत हुआ है। हालांकि, वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए नमूने प्रयोगशालाओं में भेजे जा रहे हैं।
डॉटी की मौत ने उसके 15-16 माह के दो शावकों को भी संकट में डाल दिया है। मां से बिछड़े इन शावकों की सुरक्षा अब वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। विभाग उनकी गतिविधियों पर नजर रख रहा है।
हर छह दिन में एक मौत, सालाना आंकड़ा भी डरा रहा
मध्यप्रदेश में इस साल अब तक 48 बाघों की मौत हो चुकी है। पिछले साल यह आंकड़ा 55 था। अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो इस साल भी बाघों की मौत का आंकड़ा पिछले वर्ष के आसपास पहुंच सकता है।
बाघों की मौत के पीछे आपसी संघर्ष प्रमुख कारणों में शामिल है। इसके अलावा करंट लगने और शिकार की घटनाएं भी सामने आई हैं। हालांकि, सभी 48 मौतों के कारणों का विस्तृत और प्रमाणित ब्योरा सामने आए बिना किसी एक वजह को इन मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन मौतों का यह आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि बाघों की सुरक्षा केवल उनकी संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। उनके प्राकृतिक आवास, सुरक्षित विचरण क्षेत्र और वन्यजीव गलियारों की हिफाजत भी उतनी ही जरूरी है।
अभयारण्यों के बाहर 20 मौतें, सुरक्षा का दायरा कितना मजबूत?
इस साल हुई 48 मौतों में से 20 बाघों की जान अभयारण्यों के बाहर गई। यह आंकड़ा संरक्षण की उस चुनौती की ओर इशारा करता है, जो संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं से बाहर मौजूद है।
बाघों का विचरण अब केवल अभयारण्यों तक सीमित नहीं है। ऐसे में जंगलों से लगे इलाकों, राजस्व भूमि और मानव आबादी के आसपास उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है। इन क्षेत्रों में बिजली के तारों से करंट लगना, शिकार और दूसरे बाघों के साथ क्षेत्र को लेकर संघर्ष जानलेवा साबित हो सकते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अभयारण्यों के बाहर बाघों की निगरानी कितनी प्रभावी है? संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध बिजली कनेक्शनों और शिकार पर अंकुश लगाने के लिए क्या पर्याप्त इंतजाम हैं? बाघों के प्राकृतिक गलियारों को सुरक्षित रखने की दिशा में कितनी प्रगति हुई है?
इन सवालों के जवाब केवल मौतों की संख्या से नहीं, बल्कि प्रत्येक घटना की जांच और उसके बाद की गई कार्रवाई से सामने आएंगे।
785 बाघों वाला मप्र, लेकिन सुरक्षा की चुनौती बरकरार
वर्ष 2022 की बाघ गणना में मध्यप्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए थे। इस उपलब्धि के साथ प्रदेश देश में पहले स्थान पर रहा। बाघों की यह आबादी प्रदेश के लिए गौरव की बात है, लेकिन इसके साथ संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ती है।
बाघों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए पर्याप्त क्षेत्र, शिकार के प्राकृतिक संसाधन और सुरक्षित विचरण गलियारों की जरूरत भी बढ़ती है। यदि बाघों के बीच क्षेत्र को लेकर संघर्ष बढ़ता है या वे भोजन और सुरक्षित आवास की तलाश में जंगलों से बाहर निकलते हैं, तो उनके सामने नए खतरे पैदा हो सकते हैं।
हालांकि, प्रदेश में हुई सभी मौतों के कारणों का विश्लेषण किए बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि बाघों की बढ़ती आबादी ही मौतों की वजह है। जरूरत इस बात की है कि मौतों के कारणों की पारदर्शी समीक्षा हो और उन क्षेत्रों की पहचान की जाए, जहां बाघों के लिए खतरे लगातार बने हुए हैं।
डॉटी की मौत से बढ़ी चिंता, दो शावकों का क्या होगा?
बांधवगढ़ की प्रसिद्ध बाघिन डॉटी की मौत सिर्फ एक बाघिन का जाना नहीं, बल्कि उसके पीछे छूटे दो शावकों के भविष्य से जुड़ा सवाल भी है।
बांधवगढ़ प्रबंधन के अनुसार, डॉटी का जन्म वर्ष 2011-12 में मगधी क्षेत्र में प्रसिद्ध बाघिन पटिहा और नर बाघ ब्लू आई के यहां हुआ था। उसने अपने जीवनकाल में तीन से चार बार शावकों को जन्म दिया और उन्हें बड़ा किया। बाद में अपनी मादा संतान के क्षेत्र से हटाए जाने के बाद उसने ताला क्षेत्र में अपना नया इलाका बनाया, जहां उसने दो और शावकों को जन्म दिया।
बांधवगढ़ के संरक्षण इतिहास में डॉटी की अहम भूमिका रही है। अब उसकी मौत के बाद 15-16 माह के दोनों शावकों की सुरक्षा और निगरानी महत्वपूर्ण हो गई है।
इस उम्र में शावक अपनी मां से अलग होने के बाद जंगल में स्वतंत्र रूप से रहने की दिशा में बढ़ रहे होते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा का आकलन उनकी वास्तविक स्थिति, शिकार करने की क्षमता और क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों के आधार पर ही किया जा सकता है। वन विभाग की निगरानी इसलिए अहम है, ताकि जरूरत पड़ने पर समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके।
संरक्षण का पैमाना सिर्फ संख्या नहीं, सुरक्षित जीवन भी
मध्यप्रदेश ने बाघों की संख्या के मामले में देश में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। लेकिन बाघ संरक्षण की सफलता का आकलन केवल गणना में दर्ज संख्या से नहीं हो सकता। यह भी देखना होगा कि बाघ कितने सुरक्षित हैं, उनके प्राकृतिक आवास कितने संरक्षित हैं और अभयारण्यों के बाहर उनके सामने आने वाले खतरों से निपटने के लिए व्यवस्था कितनी सक्षम है।
इस साल अब तक 48 बाघों की मौत और इनमें से 20 मौतों का अभयारण्यों के बाहर होना संरक्षण रणनीति की व्यापक समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करता है।
बाघों की गिनती में अव्वल होना उपलब्धि है, लेकिन उनकी जान बचाना असली परीक्षा।
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