वो नमक जो खेत में नहीं उगता, सिर्फ सूरज और हवा से बनता है, आज उसी मौसम की मार से बर्बाद हो,रहा है,बेमौसम बारिश, लेट मानसून और चक्रवात ने गुजरात की क्यारियों का गणित बिगाड़ दिया,जहाँ से देश का 85% नमक आता हैक्या हमारी थाली से 'चुटकी भर नमक' का स्वाद भी छिन  जाएगा?  पूरी रिपोर्ट पढ़ें
नई दिल्ली.// वो चुटकी भर नमक जो आपकी थाली का स्वाद तय करता है, अब जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी मार झेल रहा है।नमक इकलौती ऐसी चीज है जो खेत में बोई नहीं जाती। न ये चावल की तरह पानी में उगती है, न आम की तरह पेड़ पर फलती है। ये तो सिर्फ तीन चीजों से बनती है - तेज सूरज, सूखी हवा और लंबा, बिना बारिश वाला मौसम।सदियों से यही गणित चल रहा था। समंदर का खारा पानी, कच्छ की उथली क्यारियों में और महीनों की धूप में पानी उड़ जाता है, पीछे बच जाता है - सफेद सोना।
लेकिन अब इस गणित को जलवायु परिवर्तन ने पूरी तरह बिगाड़ दिया है। हम सोचते हैं गर्मी बढ़ेगी तो वाष्पीकरण तेज होगा, नमक जल्दी बनेगा। हकीकत इसके ठीक उलट है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक उत्पादक है। हर साल करीब 3.07 करोड़ टन नमक पैदा होता है और इसका 85% अकेले गुजरात से आता है, खासकर लिटिल रण ऑफ कच्छ से। लिटिल रण ऑफ कच्छ पर हुई एक स्टडी ने साफ चेतावनी दी है - मौसम में अत्यधिक बदलाव से नमक बनाने का पूरा चक्र गड़बड़ा गया है।नमक पर क्लाइमेट चेंज की 'ट्रिपल मार'
1. बेमौसम बारिश - सबसे बड़ा दुश्मन: नमक जब बनने ही वाला होता है, क्यारी में गाढ़ा घोल तैयार होता है, तभी एक बेमौसम बारिश सब बर्बाद कर देती है। घोल पतला हो जाता है और महीनों की मेहनत से जमा हुआ कच्चा नमक बह जाता है।
2. मानसून की लेट विदाई: पहले अक्टूबर में क्यारियां तैयार हो जाती थीं। अब मानसून अक्टूबर-नवंबर तक खिंच रहा है। नतीजा - नमक बनाने का सीजन ही 2 से 3 महीने देरी से शुरू हो रहा है। उत्पादन का समय घट गया है।
3. चक्रवाती तूफान: अरब सागर में बढ़ते चक्रवात सीधे कच्छ के तट से टकरा रहे हैं। तेज हवाएं और ज्वार-भाटा मिट्टी के कच्चे बांधों को तोड़ देते हैं, क्यारियों को समंदर में मिला देते हैं।

आपकी रसोई तक कैसे पहुंचेगा ये संकट?

आप सोचेंगे नमक तो बहुत है, क्या फर्क पड़ेगा? फर्क पड़ेगा, और बहुत पड़ेगा।
कोई विकल्प नहीं: सफेद सोने का कोई कृत्रिम विकल्प नहीं है। नमक कम होगा तो सिर्फ रसोई नहीं, पूरा बाजार हिलेगा। नमक से ही सोडा ऐश, क्लोरीन, दवाइयां, चमड़ा और टेक्सटाइल उद्योग चलता है।
गुणवत्ता पर हमला: बढ़ते प्रदूषण से अब समुद्री नमक में माइक्रोप्लास्टिक मिलने लगा है। अत्यधिक गर्मी से वाष्पीकरण की दर बिगड़ रही है, जिससे नमक में मौजूद आयोडीन, मैग्नीशियम जैसे प्राकृतिक खनिजों का संतुलन भी बिगड़ रहा है।
सेंधा नमक पर दबाव: जब समुद्री नमक का उत्पादन घटेगा, तो चट्टानी सेंधा नमक की मांग बढ़ेगी। इससे अंधाधुंध खनन और प्राकृतिक भंडारों पर दबाव बढ़ेगा।
सबसे बड़ी मार - अगारिया पर: इसका सीधा असर कच्छ के 8 महीनों तक तपती रेत में रहने वाले पारंपरिक नमक-किसानों, यानी अगारिया समुदाय पर पड़ रहा है। फसल बार-बार बर्बाद होने से उनकी लागत बढ़ रही है और पलायन तेज हो रहा है। उत्पादन घटा तो कीमत बढ़ेगी और आखिर में बोझ आपकी जेब पर आएगा।
जलवायु परिवर्तन सिर्फ ग्लेशियर पिघलने या गर्मी बढ़ने की कहानी नहीं है। ये हमारी थाली के उस सबसे सस्ते और सबसे जरूरी स्वाद पर भी हमला है, जिसे हम 'चुटकी भर' समझकर भूल जाते हैं।