नई दिल्ली। अनुकंपा नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने पोते के दावे का रास्ता साफ किया है। शीर्ष अदालत ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें रेलवे को मृत कर्मचारी के पोते जितेंद्र वर्मा के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और रेलवे की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई उचित आधार नहीं है।
क्या पोते को दादा-दादी की जगह नौकरी मिल सकती है?
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए केवल पुत्र, पुत्री, विधवा या विधुर तक ही दायरा सीमित नहीं है। संबंधित नियमों में निर्धारित शर्तों के तहत निकट संबंधी और वैध रूप से गोद लिए गए पुत्र-पुत्री भी विचार के दायरे में आ सकते हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि जितेंद्र को मृत कर्मचारी का वैध दत्तक पुत्र नहीं माना जाता, तब भी पोता होने के कारण वह ‘निकट संबंधी’ की श्रेणी में आता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर पोते को स्वतः अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिल जाएगा। दावा संबंधित विभाग के नियमों, पारिवारिक स्थिति और पात्रता की शर्तों के आधार पर ही तय होगा।
रेलवे ने क्यों खारिज किया था दावा?
मामला जितेंद्र वर्मा की दादी छमा बाई की मृत्यु के बाद उनकी जगह अनुकंपा नियुक्ति के दावे से जुड़ा था। रिकॉर्ड के मुताबिक जितेंद्र के दादा की 2002 में और उनके पिता की 2006 में मृत्यु हो चुकी थी।
वर्ष 2007 में जितेंद्र का नाम छमा बाई के सर्विस रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी/नामिनी के रूप में दर्ज किया गया था। बाद में 30 जनवरी 2018 को उन्होंने सिविल कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र भी हासिल किया।
जितेंद्र ने दावा किया कि वह छमा बाई के दत्तक पुत्र हैं। रेलवे ने उनके गोद लिए जाने की वैधता पर सवाल उठाते हुए अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने रेलवे के फैसले पर उठाए सवाल
मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के प्रावधानों की जांच की। हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित नीति में पुत्र-पुत्री, विधवा या विधुर के साथ निर्धारित परिस्थितियों में निकट संबंधी को भी नियुक्ति के लिए विचार योग्य माना गया है।
कोर्ट ने यह भी माना कि जितेंद्र परिवार का अकेला जीवित सदस्य था। इसलिए उसे केवल इस आधार पर दावे से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह वैध दत्तक पुत्र साबित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने रेलवे को 30 दिन के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया था। साथ ही जितेंद्र को मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं बदला फैसला
रेलवे और केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने इस चुनौती को खारिज कर दिया। इससे हाईकोर्ट का 25 फरवरी 2026 का फैसला प्रभावी बना हुआ है।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण?
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में रिश्ते की श्रेणी और विभागीय नियमों की व्याख्या महत्वपूर्ण होगी। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि आवेदक मृत कर्मचारी का बेटा या बेटी नहीं है।
विशेष परिस्थितियों में पोते जैसे निकट संबंधी के दावे पर भी संबंधित नियमों के तहत विचार किया जा सकता है।