किशोर उम्र में मोबाइल और सोशल मीडिया पर हुई दोस्ती कब गंभीर कानूनी उलझन में बदल जाए, इसका अंदाजा कई परिवारों को तब होता है जब मामला थाने और अदालत तक पहुंच जाता है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की तीनों पीठों में पॉक्सो अधिनियम से जुड़ी 14,531 आपराधिक अपीलों के लंबित होने के आंकड़े ने इसी चिंता को सामने ला दिया है। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में मामलों में पीड़ितों की उम्र 16 से 18 वर्ष और आरोपितों की उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच है। हाईकोर्ट ने नए मामलों की संख्या कम करने के लिए कानून के व्यापक प्रचार-प्रसार और किशोरों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया है।

इटारसी-/नर्मदापुरम//   

किशोरावस्था में आकर्षण, सोशल मीडिया के जरिए बढ़ता संपर्क और पॉक्सो कानून की अधूरी जानकारी कई परिवारों के लिए गंभीर कानूनी संकट का कारण बन रही है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की तीनों पीठों में पॉक्सो अधिनियम से संबंधित 14,531 आपराधिक अपीलें लंबित होने पर न्यायालय ने भी चिंता जताई है। इन मामलों में बड़ी संख्या ऐसे प्रकरणों की बताई जा रही है, जिनमें पीड़िताओं की उम्र 16 से 18 वर्ष और आरोपित युवकों की उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच है।

इटारसी-नर्मदापुरम में भी जागरूकता की जरूरत

नर्मदापुरम जिले में इटारसी सहित शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर,किशोरियों के बीच मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. ऐसे में स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थानों के साथ परिवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है,किशोरों को केवल अनुशासन का पाठ पढ़ाने के बजाय उन्हें कानून, सहमति, सोशल मीडिया व्यवहार और साइबर सुरक्षा की स्पष्ट जानकारी देना जरूरी है।

अधिवक्ता अंशिका सिंह के अनुसार किशोरावस्था का आकर्षण  , सोशल मीडिया पर दोस्ती और कानून की जानकारी का अभाव कई बार ऐसे घटनाक्रम को जन्म दे देता है, जिसका असर केवल किशोर,किशोरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दोनों परिवारों को भी सामाजिक और मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है।18 वर्ष से कम उम्र में 'सहमति' का कानूनी अर्थ अलग

कानून की दृष्टि से 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति बच्चा है,  केवल मित्रता या प्रेम संबंध अपने आप में पॉक्सो अपराध नहीं हैं,लेकिन नाबालिग के  साथ यौन कृत्य के मामलों में उसकी कथित सहमति को कानून वयस्क की तरह वैध   सहमति नहीं मानता,यही वह बिंदु है जिसकी जानकारी किशोरों और उनके अभिभावकों तक सरल भाषा में पहुंचाना जरूरी है।

परिवार में संवाद की कमी भी बन सकती है जोखिम

किशोर,किशोरियों के साथ परिवार में खुलकर बातचीत नहीं होने पर वे रिश्तों, सोशल  मीडिया संपर्क अथवा किसी परेशानी की जानकारी अभिभावकों से साझा करने में   झिझक सकते हैं,इसलिए अभिभावकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि किशोरों के सवालों और व्यवहार पर केवल रोक लगाने के बजाय उनसे संवाद किया जाए।

स्कूल-कॉलेजों में हो नियमित कानूनी जागरूकता अभियान

अधिवक्ता अंशिका सिंह का कहना है कि स्कूलों, महाविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में नियमित 'किशोर कानूनी जागरूकता एवं सुरक्षा अभियान' चलाया जाना चाहिए। इसमें पॉक्सो कानून के साथ सोशल मीडिया सुरक्षा, साइबर अपराध, बाल विवाह और बाल अधिकारों की जानकारी सरल भाषा में दी जानी चाहिए।

अधिवक्ता अंशिका सिंह के अनुसार—

“किशोरकिशोरियों को पॉक्सो कानून की जानकारी देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे अपने अधिकारों और कानून की सीमाओं को समझ सकें।”

नर्मदापुरम में क्या किया जा सकता है?

जिले में स्कूल शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस और विधिक सेवा प्राधिकरण के समन्वय से किशोर कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। इटारसी, नर्मदापुरम, पिपरिया, सोहागपुर और सिवनीमालवा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में स्कूल,कॉलेज स्तर पर विशेषज्ञों के संवाद कार्यक्रम और अभिभावक कार्यशालाएं इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं।

सवाल सिर्फ पॉक्सो के मुकदमों की संख्या का नहीं है। सवाल यह भी है कि किशोरों को कानून की जानकारी घटना के बाद मिले या उससे पहले। समय रहते सही जानकारी और परिवार में खुला संवाद कई मामलों को गंभीर कानूनी विवाद बनने से रोकने में मदद कर सकता है।