भोपाल। प्रदेश मे स्वामित्व योजना के तहत  50 लाख आवासीय भूखंडों की निःशुल्क रजिस्ट्री का अभियान अब सिर्फ सरकार और पटवारियों के बीच टकराव नहीं रह गया है। इस पूरी कवायद की नीति और उपयोगिता पर ही सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अभियान लागू करने से पहले आगर मालवा, हरदा, बड़वानी, अशोकनगर और रायसेन में पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था और इसी दौरान पटवारियों ने व्यावहारिक दिक्कतें सामने रख दी थीं, तो उन आपत्तियों का समाधान किए बिना इसे पूरे प्रदेश में क्यों लागू किया गया?
अभियान शुरू हुए 17 दिन हो चुके हैं, लेकिन पटवारी अब भी रजिस्ट्री में विक्रेता बनने को तैयार नहीं हैं। मामला इतना बढ़ गया है कि मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने कलेक्टरों को इनकार करने वाले पटवारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इसके जवाब में पटवारी संघ ने भी साफ कर दिया है कि बर्खास्तगी की कार्रवाई हुई तो वे सामान्य राजस्व कामकाज तक बंद कर सकते हैं।
असली सवाल रजिस्ट्री की जरूरत पर
जमीनी मामलों के जानकार और पूर्व अधिकारी ओपी भट्ट ने अभियान की मूल जरूरत पर ही सवाल उठाया है। उनका कहना है कि आवासीय भूखंड पर बैंक ऋण लेने के लिए हर स्थिति में रजिस्ट्री अनिवार्य नहीं है। स्वामित्व योजना के तहत हितग्राहियों को पहले ही जमीन से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराए जा चुके हैं।
इनमें नक्शा, खसरा, खतौनी और बही की प्रति शामिल हैं। स्वामित्व योजना के तहत 2021 से अब तक करीब 68 लाख लोगों को ऐसे दस्तावेज दिए जा चुके हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि जब हितग्राही को जमीन का मालिकाना दस्तावेज पहले ही दिया जा चुका था तो 50 लाख भूखंडों की अलग से रजिस्ट्री कराने की जरूरत क्यों पड़ी?
बैंक रजिस्ट्री मांगते हैं तो सरकार सीधे निर्देश क्यों नहीं देती?
सरकार का तर्क है कि रजिस्ट्री होने से हितग्राहियों को बैंक से कर्ज लेने में आसानी होगी। लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि यदि किसी बैंक की प्रक्रिया में रजिस्ट्री की प्रति अनिवार्य की जा रही है और मौजूदा दस्तावेजों के आधार पर ऋण नहीं दिया जा रहा, तो इसका समाधान 50 लाख रजिस्ट्रियों का नया अभियान होना चाहिए या बैंकों को स्पष्ट सरकारी निर्देश जारी करना?
यही सवाल अब पूरे अभियान की लागत और जरूरत को लेकर भी उठ रहा है।
4000 करोड़ के राजस्व का सवाल भी
सामान्य तौर पर रजिस्ट्री से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है। 50 लाख भूखंडों की रजिस्ट्री निःशुल्क किए जाने से करीब 4000 करोड़ रुपए के संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान बताया जा रहा है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि रजिस्ट्री मुफ्त क्यों की जा रही है, बल्कि यह भी है कि इतने बड़े राजस्व त्याग के बदले हितग्राहियों को मिलने वाला वास्तविक अतिरिक्त लाभ क्या है?
पटवारियों की सबसे बड़ी आपत्ति: हमें विक्रेता क्यों बनाया?
रजिस्ट्री की प्रक्रिया में क्रेता और विक्रेता दोनों पक्ष होते हैं। सरकार ने इन भूखंडों की रजिस्ट्री में पटवारियों को विक्रेता की भूमिका में रखा है। पटवारियों का विरोध इसी बिंदु पर सबसे ज्यादा है।
उनका कहना है कि जमीन से जुड़े मामलों में पारिवारिक और स्वामित्व विवाद आम हैं। 50 लाख प्रकरणों में यदि विवाद सामने आते हैं तो विक्रेता के रूप में पटवारियों को भी पक्षकार बनाया जा सकता है। इससे वे ऐसे न्यायालयीन विवादों में फंस सकते हैं जिनसे उनका मूल राजस्व कार्य से सीधा संबंध नहीं है।
पायलट प्रोजेक्ट में आपत्ति आई, फिर भी नहीं बदली व्यवस्था
अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यही है कि सरकार ने इसे सीधे पूरे प्रदेश में लागू नहीं किया था। पहले पांच जिलों में पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया।
यहीं पटवारियों ने अपनी आपत्तियां सामने रखी थीं। सूत्रों के अनुसार पायलट जिलों से मिले फीडबैक में प्रक्रिया से जुड़ी व्यावहारिक समस्याएं भी सामने आईं। इसके बावजूद अभियान को प्रदेशभर में लागू कर दिया गया।
अब वही आपत्तियां प्रदेशव्यापी विवाद का रूप ले चुकी हैं।
17 अक्टूबर की समयसीमा ने बढ़ाया दबाव
सरकार ने 50 लाख दस्तावेजों की रजिस्ट्री का लक्ष्य 17 अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। लक्ष्य बड़ा होने के कारण रजिस्ट्री के अधिकार तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, पंचायत समन्वयक सहित अन्य अधिकारियों को भी दिए गए हैं।
लेकिन जिस प्रक्रिया में पटवारियों की भूमिका को लेकर ही सहमति नहीं बन पा रही, उसमें समयसीमा पूरी करना प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है।
अब मामला योजना से ज्यादा टकराव का
एक तरफ शासन अभियान को हितग्राहियों के लिए लाभकारी बता रहा है, वहीं पटवारी संघ योजना से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष काम से अलग रहने की बात कह चुका है। संघ का कहना है कि वह इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाएगा।
इस पूरे विवाद ने तीन बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं—
जब मालिकाना दस्तावेज पहले ही दिए जा चुके थे तो रजिस्ट्री की जरूरत क्यों पड़ी?
जब पांच जिलों के पायलट में आपत्तियां सामने आ गई थीं तो उन्हें दूर किए बिना प्रदेशभर में योजना क्यों लागू की गई?
और जब 50 लाख रजिस्ट्रियों से हजारों करोड़ रुपए के संभावित राजस्व का त्याग होना है, तो उसके बदले हितग्राहियों को मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का स्पष्ट आकलन कहां है?
फिलहाल सरकार और पटवारियों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। 17 अक्टूबर की समयसीमा नजदीक है और उससे पहले यह स्पष्ट होना बाकी है कि 50 लाख रजिस्ट्रियों का लक्ष्य कैसे पूरा होगा।