भोपाल/ मध्य प्रदेश में ग्रामीण अस्पतालों की बदहाली और डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए सरकार अब दोहरी रणनीति पर काम कर रही है। बांड की शर्त पूरी नहीं करने वाले डॉक्टरों का मेडिकल पंजीयन निलंबित करने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ डॉक्टर नौकरी छोड़कर न भागें, इसके लिए सांसदों, विधायकों और कलेक्टरों तक को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
सवाल यह है कि जब डॉक्टरों को गांव में टिकाने के लिए जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की मदद लेनी पड़ रही है, तो क्या समस्या सिर्फ डॉक्टरों की अनिच्छा है या ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां भी इसकी बड़ी वजह हैं?
बांड तोड़ने वालों पर कार्रवाई, पुराने रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे
राज्य सरकार वर्ष 2022 के बाद डिग्री पूरी करने के बावजूद अनिवार्य ग्रामीण सेवा के लिए ज्वाइन नहीं करने वाले डॉक्टरों का रिकॉर्ड खंगाल रही है। सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों से ऐसे डॉक्टरों की सूची मांगी गई है, जिन्होंने बांड के तहत निर्धारित सेवा पूरी नहीं की।
नियमों के तहत पात्र डॉक्टरों के मेडिकल पंजीयन को निलंबित या रद्द करने की कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है—सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई पूरी करने वाले डॉक्टर ग्रामीण सेवा की अनिवार्य शर्त से बचकर न निकल सकें।
लेकिन इस कार्रवाई का दायरा और वास्तविक प्रभाव सामने आना अभी बाकी है। यह भी देखना होगा कि कितने डॉक्टरों को नोटिस दिया जाता है और कितने मामलों में पंजीयन निलंबन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
पहली बार कलेक्टरों को डॉक्टरों के लिए विशेष निर्देश
स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव सुखबीर सिंह ने सभी जिलों के कलेक्टरों को पत्र लिखकर बांडेड डॉक्टरों की सुरक्षा, आवास और अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं सुनिश्चित करने को कहा है। उद्देश्य यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थापना मिलने के बाद डॉक्टर बीच में सेवा छोड़कर न जाएं।
उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल भी सांसदों और विधायकों को पत्र लिखने की तैयारी में हैं। उनसे अपेक्षा की जाएगी कि वे अपने क्षेत्रों में पदस्थ बांडेड डॉक्टरों को प्रोत्साहित करें, उनकी समस्याएं सुनें और स्थानीय स्तर पर समाधान कराने में सहयोग दें।
यानी अब डॉक्टरों की ग्रामीण पदस्थापना केवल स्वास्थ्य विभाग का प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है। इसमें जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी बढ़ाई जा रही है।
83 प्रतिशत डॉक्टरों ने ज्वाइन किया, लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी
सरकार के लिए राहत की बात यह है कि वर्ष 2026 में बांडेड डॉक्टरों की ज्वाइनिंग में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।
वर्ष 2024: 2,670 डॉक्टरों की पोस्टिंग हुई, जिनमें से 1,116 ने ज्वाइन किया।
वर्ष 2025: 2,789 डॉक्टरों की पोस्टिंग हुई, जिनमें से 1,103 ने सेवा शुरू की।
वर्ष 2026: 3,118 डॉक्टरों की पोस्टिंग हुई, जिनमें से 2,601 ने ज्वाइन किया।
इस साल ज्वाइनिंग का आंकड़ा लगभग 83 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि पिछले दो वर्षों में यह करीब 40 प्रतिशत था।
हालांकि, ज्वाइनिंग और सेवा अवधि पूरी करने में फर्क है। डॉक्टरों का पदस्थापना स्थल पर पहुंचना पहली चुनौती है, लेकिन उन्हें पूरे एक साल तक वहां बनाए रखना दूसरी चुनौती। इसलिए सरकार की असली परीक्षा अब यह होगी कि ज्वाइन कर चुके डॉक्टरों में से कितने निर्धारित अवधि पूरी करते हैं।
55 हजार रुपये मानदेय, सुविधाओं की कमी और छुट्टी की परेशानी
ग्रामीण पदस्थापना से बचने या बीच में सेवा छोड़ने के पीछे कई व्यावहारिक समस्याएं भी बताई जा रही हैं।
एमबीबीएस डॉक्टरों को 55 हजार रुपये और एमडी-एमएस डॉक्टरों को 58 हजार रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बांडेड डॉक्टरों को महीने में एक आकस्मिक अवकाश के अतिरिक्त नियमित छुट्टियों की पात्रता भी सीमित है।
दूसरी ओर, कई ग्रामीण अस्पतालों में जरूरी जांच और उपचार की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ की कमी, आवास का अभाव, परिवार के साथ रहने में परेशानी और दूरदराज के क्षेत्रों में आवागमन की दिक्कतें भी डॉक्टरों के सामने चुनौती बनती हैं।
पीजी की तैयारी करने वाले डॉक्टर ग्रामीण पदस्थापना को अतिरिक्त बाधा मानते हैं। ऐसे में केवल कानूनी सख्ती से डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा।
सामान्य वर्ग के लिए 10 लाख, आरक्षित वर्ग के लिए पांच लाख का बांड
सरकारी मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले सामान्य वर्ग के डॉक्टरों के लिए ग्रामीण क्षेत्र में एक वर्ष की सेवा अनिवार्य है। निर्धारित सेवा नहीं करने पर 10 लाख रुपये की बांड राशि भरने का प्रावधान है। आरक्षित वर्ग के लिए यह राशि पांच लाख रुपये बताई गई है।
गैर-सेवारत पीजी डॉक्टरों के लिए भी ग्रामीण सेवा और बांड संबंधी प्रावधान लागू हैं। कुछ अन्य श्रेणियों में सेवा अवधि और बांड राशि अलग हो सकती है।
सरकार ऐसे डॉक्टरों को दोबारा सेवा से जोड़ने के लिए विशेष पोर्टल के माध्यम से अवसर देने की पहल भी कर रही है, जिन्होंने बीच में सेवा छोड़ दी थी।
असली सवाल: डॉक्टरों को गांव भेजना है या गांव में टिकाना भी है?
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए डॉक्टरों की उपलब्धता जरूरी है। लेकिन किसी अस्पताल में डॉक्टर की नियुक्ति हो जाना और वहां नियमित इलाज मिलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
अगर अस्पताल में जांच की सुविधा नहीं है, जरूरी उपकरण नहीं हैं, पर्याप्त सहायक स्टाफ नहीं है या डॉक्टर के रहने की सुरक्षित व्यवस्था नहीं है, तो केवल बांड और पंजीयन निलंबन की चेतावनी से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
सरकार की नई रणनीति तभी सफल मानी जाएगी, जब ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की ज्वाइनिंग के साथ उनकी नियमित उपस्थिति और सेवा की निरंतरता भी सुनिश्चित हो।
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार की सख्ती के साथ सुविधाएं बढ़ाने की पहल कितनी जमीन पर उतरती है। डॉक्टरों को गांव भेजने का आंकड़ा सुधरना अच्छी शुरुआत है, लेकिन ग्रामीण मरीजों को समय पर इलाज मिलना ही इस पूरी कवायद की असली कसौटी होगी।
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