खास बात | रिश्ते-नाते
इटारसी //जिंदगी में कुछ लोग हमारे साथ इसलिए चलते हैं, क्योंकि उन्हें हमारे साथ की जरूरत होती है। कुछ इसलिए, क्योंकि उन्हें हमसे कुछ हासिल करना होता है। और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो तब भी हमारे साथ खड़े रहते हैं, जब हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं होता। दोस्ती की असली पहचान शायद इसी आखिरी श्रेणी में छिपी है।
प्रसिद्ध लेखक और विचारक खलील जिब्रान के नाम से जुड़ा एक विचार है— “दोस्ती हमेशा एक मधुर जिम्मेदारी है, कभी भी अवसर नहीं।”
इस कथन का मूल स्रोत प्रमाणित नहीं है, लेकिन इसमें छिपा जीवन-दर्शन रिश्तों की एक बड़ी सच्चाई सामने रखता है। दोस्ती किसी व्यक्ति की हैसियत, उसके पद, उसकी संपत्ति या उससे मिलने वाले फायदे का दूसरा नाम नहीं है। यह दो लोगों के बीच भरोसे, अपनत्व और उस एहसास का रिश्ता है, जिसमें किसी को किसी काम के लिए नहीं, बल्कि उसके अपने होने के कारण महत्व दिया जाता है।
जब मतलब खत्म होता है, तब दोस्ती की परीक्षा शुरू होती है
जब किसी व्यक्ति के पास पैसा, प्रतिष्ठा, प्रभाव या कोई ऐसा अवसर होता है, जिससे दूसरों को भी लाभ मिल सकता है, तो उसके आसपास लोगों की कमी नहीं रहती। फोन आते हैं, मुलाकातें होती हैं और आत्मीयता जताने वालों की कतार दिखाई देती है।
लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
कभी कारोबार में नुकसान हो जाता है, कभी नौकरी चली जाती है, कभी पद और प्रभाव छिन जाता है, तो कभी जीवन ऐसी परिस्थितियों में पहुंच जाता है, जहां किसी को देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं बचता।
ऐसे समय में बहुत कुछ बदलने लगता है। कुछ परिचित दूर हो जाते हैं। कुछ लोगों की व्यस्तता अचानक बढ़ जाती है। जिनके पास कभी हमारे लिए घंटों का समय था, उनके पास अब कुछ मिनट भी नहीं होते।
लेकिन इसी दौर में कोई एक व्यक्ति ऐसा भी होता है, जो बिना किसी स्वार्थ के पूछता है— 'सब ठीक तो है? किसी चीज की जरूरत हो तो बताना।'
यह छोटा-सा सवाल कभी-कभी बड़ी आर्थिक मदद से भी ज्यादा मायने रखता है। क्योंकि इसमें किसी लाभ की उम्मीद नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति के प्रति सच्ची चिंता छिपी होती है।
दोस्ती या फायदे का सौदा?
हर रिश्ते में एक-दूसरे की मदद करना स्वाभाविक है। दोस्त एक-दूसरे के काम आते हैं, अवसरों की जानकारी देते हैं और मुश्किल समय में सहारा भी बनते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है, जब दोस्ती का आधार ही फायदा बन जाता है।
जब कोई व्यक्ति केवल अपना काम निकलवाने के लिए संपर्क करे, जरूरत पूरी होते ही गायब हो जाए, आपकी पहचान और प्रभाव का इस्तेमाल करे या आपकी निजी बातों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगे, तो रिश्ते पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ऐसे रिश्तों में अपनापन दिखाई तो देता है, लेकिन उसके पीछे कोई न कोई हिसाब चलता रहता है।
किसी की मदद करने के बाद बार-बार एहसान जताना, बदले में अपनी हर बात मनवाने की अपेक्षा करना या दोस्ती को आगे बढ़ने की सीढ़ी बना लेना भी रिश्ते को कमजोर करता है।
सच्ची दोस्ती में सहयोग होता है, सौदेबाजी नहीं।
यह भी जरूरी है कि किसी एक घटना के आधार पर दोस्ती पर संदेह न किया जाए। हर व्यक्ति की अपनी परेशानियां और सीमाएं होती हैं। असली पहचान व्यवहार के लगातार दोहराए जाने वाले तरीके से होती है, किसी एक दिन की अनुपस्थिति से नहीं।
सच्चा दोस्त हर एहसान का हिसाब नहीं रखता
सच्चे दोस्त की एक खासियत होती है। वह आपके लिए कुछ करने के बाद यह इंतजार नहीं करता कि अब आप उसके लिए क्या करेंगे।
वह आपकी परेशानी सुनता है, आपकी छोटी-सी सफलता पर खुश होता है और आपकी असफलता के समय आपको कमतर महसूस नहीं कराता।
वह आपकी मदद कर सकता है, लेकिन उस मदद के बदले आपके फैसलों पर अपना अधिकार नहीं जताता। वह सलाह देता है, लेकिन अपनी सलाह न मानने पर दोस्ती खत्म करने की धमकी नहीं देता।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि दोस्ती में बराबरी या पारस्परिक सहयोग का महत्व नहीं है। रिश्ते तभी स्वस्थ रहते हैं, जब दोनों लोगों की भावनाओं और जरूरतों का सम्मान हो।
फर्क सिर्फ इतना है कि सच्चा दोस्त हर छोटी-बड़ी मदद का हिसाब रखकर रिश्ते को कर्ज में नहीं बदलता।
कभी एक दोस्त मुश्किल में होता है, तो दूसरा उसका हाथ थामता है। कुछ समय बाद परिस्थितियां बदलती हैं और भूमिकाएं भी बदल सकती हैं। दोस्ती की खूबसूरती इसी सहज आदान-प्रदान में है।
क्या आप दोस्त हैं या किसी की जरूरत?
इस विचार को केवल दूसरों पर लागू करना पर्याप्त नहीं है। कभी-कभी हमें खुद से भी कुछ सवाल पूछने चाहिए।
क्या हम अपने दोस्तों को तब भी याद करते हैं, जब हमें उनसे कोई काम नहीं होता?
क्या हम उनकी सफलता पर दिल से खुश होते हैं, या भीतर ही भीतर उनसे अपनी तुलना करने लगते हैं?
क्या हम उनकी परेशानी सुनने के लिए समय निकालते हैं, या बातचीत को तुरंत अपनी जरूरतों की ओर मोड़ देते हैं?
क्या हम उनकी किसी मदद को अपना अधिकार समझने लगते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल— क्या हम किसी दोस्त की निजता और सीमाओं का सम्मान करते हैं?
दोस्ती का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि हमारे कितने दोस्त हैं। यह इस बात से भी तय होता है कि हम खुद किसी के लिए कितने भरोसेमंद दोस्त हैं।
किसी की जरूरत के समय साथ खड़ा होना अच्छी बात है, लेकिन उस मदद का इस्तेमाल बाद में उसे नियंत्रित करने के लिए करना दोस्ती नहीं है।
किसी का विश्वास जीतना बड़ी बात है, लेकिन उस विश्वास की रक्षा करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
दोस्ती में 'न' कहने की भी जगह होनी चाहिए
एक सच्ची दोस्ती की पहचान यह भी है कि उसमें आप बिना डर के अपनी असहमति जाहिर कर सकें।
यदि आप किसी दोस्त की मदद नहीं कर पा रहे हैं, तो क्या वह आपकी मजबूरी समझता है? क्या आप अपनी आर्थिक, व्यक्तिगत या पारिवारिक सीमाएं उसके सामने रख सकते हैं? क्या किसी बात पर असहमति होने के बाद भी आपके रिश्ते में सम्मान बना रहता है?
यदि हर बार मदद न कर पाने पर आपको अपराधबोध दिया जाता है, आपकी नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं या दोस्ती तोड़ने की धमकी मिलती है, तो रिश्ते के स्वरूप पर विचार करना जरूरी है।
दोस्ती का अर्थ हर समय उपलब्ध रहना नहीं है। इसका अर्थ है, उपलब्ध होने पर ईमानदारी से साथ देना और अनुपलब्ध होने पर भी एक-दूसरे के सम्मान को बनाए रखना।
जहां भरोसा होता है, वहां सीमाओं के लिए भी जगह होती है।
दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात
दोस्ती का सबसे बड़ा उपहार यह है कि इसमें आपको हर समय कुछ साबित नहीं करना पड़ता।
आप सफल हों या असफल, अमीर हों या साधारण, प्रभावशाली हों या बिल्कुल अकेले— कोई व्यक्ति आपको आपकी उपलब्धियों से आगे जाकर भी देखता है।
वह आपकी कमजोरियों को जानता है, फिर भी आपका सम्मान करता है। आपकी गलतियों पर आपको समझाता है, लेकिन आपकी असफलता का मजाक नहीं बनाता। आपकी खुशी में शामिल होता है, लेकिन आपकी जिंदगी पर अपना दावा नहीं जताता।
ऐसा दोस्त आपके लिए हर समस्या का समाधान नहीं कर सकता, लेकिन उसकी मौजूदगी आपको यह एहसास दिला सकती है कि आप अपनी मुश्किलों में बिल्कुल अकेले नहीं हैं।
कई बार दोस्ती का अर्थ किसी बड़ी मदद से नहीं, बल्कि चुपचाप साथ बैठने, बिना टोके बात सुनने या मुश्किल दिन के बाद हाल पूछने से पूरा होता है।
रिश्तों की दुनिया में इन छोटी बातों की कीमत अक्सर तब समझ आती है, जब इनकी कमी महसूस होने लगती है।
आखिर में...
खलील जिब्रान के नाम से प्रचलित उक्त विचार का सार यही है कि दोस्ती को लाभ कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि निभाने योग्य रिश्ता समझना चाहिए।
हर दोस्त हर परिस्थिति में हमारी मदद नहीं कर सकता। हर रिश्ता हमेशा एक जैसा भी नहीं रहता। लेकिन जहां सच्चा अपनापन होता है, वहां स्वार्थ के बजाय संवेदना, दिखावे के बजाय भरोसा और अधिकार जताने के बजाय सम्मान को महत्व दिया जाता है।
इसलिए जिंदगी में दोस्तों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है ऐसे रिश्तों को पहचानना और संजोना, जिनमें आपसे ज्यादा आपकी मौजूदगी मायने रखती हो।
क्योंकि अच्छा दोस्त वह नहीं, जो आपकी हैसियत से अपनी पहचान बनाए; अच्छा दोस्त वह है, जो आपकी हैसियत बदल जाने पर भी आपको उसी अपनत्व से देखे।
और एक बात हमेशा याद रखिए— सच्चा दोस्त पाने की चाह रखने से पहले, किसी के लिए सच्चा दोस्त बनना भी जरूरी है।
कौन है खालील जिब्रान ?
खलील जिब्रान (Kahlil Gibran) विश्व प्रसिद्ध लेबनानी-अमेरिकी कवि, दार्शनिक, निबंधकार, उपन्यासकार और बेहतरीन चित्रकार थे। उनका जन्म 6 जनवरी 1883 को लेबनान के बशारी गाँव में हुआ था और उनकी मृत्यु 10 अप्रैल 1931 को न्यूयॉर्क में हुई थी। वे अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में शेक्सपियर और लाओत्सु के बाद तीसरे सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले कवि माने जाते हैं।
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