इटारसी।सुबह शहर की सड़क पर पहला कदम रखते ही कई चेहरे नजर आते हैं। हम उन्हें रोज देखते हैं, लेकिन शायद ही कभी ठहरकर पहचानते हैं।
सड़क किनारे बैठा मोची जूते की टूटी सिलाई ठीक कर रहा है। अखबार वाला घरों के दरवाजों तक सुबह की खबर पहुंचा रहा है। नाई अपनी छोटी-सी दुकान में किसी के बाल संवार रहा है। पंचर वाला टायर में हवा भरकर किसी की रुकी हुई यात्रा फिर शुरू कर रहा है।
कोई रातभर चौकीदारी करने के बाद सुबह घर लौट रहा है तो कोई भोर से पहले शहर का कचरा समेटने निकल चुका है। प्रेस वाला कपड़ों की सिलवटें दूर कर रहा है।
ये चेहरे शहर के पोस्टर पर नहीं होते, लेकिन शहर की रोजमर्रा की जिंदगी इनकी मेहनत से चलती है।
जरूरत के वक्त सबसे पहले याद आते हैं
इन लोगों की खासियत ही शायद यही है कि उनकी मौजूदगी तब तक महसूस नहीं होती, जब तक उनकी जरूरत न पड़ जाए।
जूते की पट्टी टूट जाए तो मोची याद आता है।
रास्ते में बाइक का टायर पंचर हो जाए तो पंचर वाला दिखाई देने लगता है।
अचानक कहीं जाना हो और कपड़े तैयार न हों तो प्रेस वाला जरूरी हो जाता है।
छोटीसी परेशानी होती है, लेकिन उसका समाधान अक्सर किसी ऐसे व्यक्ति के पास  होता है, जिसे हम रोज देखते हुए भी नजरअंदाज कर देते हैं।
शहर की बड़ी व्यवस्थाओं के बीच ये छोटे काम हमारी जिंदगी को आसान बनाए रखते हैं।
फुटपाथ की छोटी दुकान, घर की बड़ी सुविधा
मोची के पास बैठा व्यक्ति सिर्फ जूता नहीं सुधरवा रहा होता। वह शायद उस जूते को कुछ और महीनों की जिंदगी दे रहा होता है।
पंचर वाला सिर्फ ट्यूब में हवा नहीं भरता, वह किसी कर्मचारी को समय पर दफ्तर पहुंचने, किसी बच्चे को स्कूल पहुंचने या किसी परिवार को अपनी मंजिल तक जाने में मदद करता है।
नाई सिर्फ बाल नहीं काटता। कई मोहल्लों में उसकी दुकान लोगों के मिलने-बैठने और रोजमर्रा की खबरों के आदान-प्रदान की छोटी-सी जगह भी होती है।
प्रेस वाला कपड़ों को सिर्फ इस्त्री नहीं करता, वह किसी की सुबह को थोड़ा और व्यवस्थित कर देता है।
कचरे में भी शहर के लिए काम
शहर की गलियों में कचरा बीनते लोग शायद सबसे कम दिखाई देने वाले मददगार हैं।
घर और बाजार से निकलने वाले कचरे में से उपयोगी और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री अलग करना आसान काम नहीं है। धूप, धूल, बदबू और जोखिम के बीच वे ऐसा काम करते हैं, जिसका फायदा पूरे शहर को मिलता है।
उनकी मेहनत स्वच्छता और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया में योगदान देती है, लेकिन बदले में उन्हें अक्सर सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक पहचान उतनी नहीं मिलती, जितनी उनके काम की जरूरत बताती है।
जिस कचरे से हम छुटकारा पा लेते हैं, उसमें भी किसी की रोजी और शहर के लिए उपयोगिता छिपी होती है।
जब शहर सोता है, कुछ लोग जागते हैं
रात में जब बाजार बंद हो जाते हैं और ज्यादातर घरों में रोशनी बुझने लगती है, तब चौकीदार की ड्यूटी शुरू होती है।
किसी कॉलोनी का गेट, किसी दुकान का शटर, किसी कार्यालय का परिसर या किसी पार्क की सुरक्षा—कई जगहों पर रात का भरोसा एक चौकीदार के जागते रहने से बना रहता है।
सुबह अखबार वाला आता है। दूध वाला आता है। सफाईकर्मी निकलते हैं। सड़क किनारे छोटी दुकानें खुलने लगती हैं।
एक शहर सोकर उठता है, लेकिन उसकी सुबह की तैयारी कई लोग रात से ही शुरू कर चुके होते हैं।
बदलते शहर में भी कायम हैं ये छोटे हुनर
समय बदल रहा है। ऑनलाइन सेवाएं बढ़ रही हैं। बड़े सर्विस सेंटर और मशीनें छोटे कारोबारों को चुनौती दे रहे हैं।
फिर भी हर जरूरत ऑनलाइन नहीं पूरी होती।
गली का पंचर वाला, मोहल्ले का नाई, फुटपाथ का मोची, स्थानीय प्रेस वाला और छोटी-मोटी मरम्मत करने वाला व्यक्ति आज भी शहर की स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।
इनके पास अक्सर बड़ी दुकान नहीं होती, बड़ा बोर्ड नहीं होता और प्रचार का बजट भी नहीं होता।
लेकिन इनके पास एक चीज होती है—जरूरत पड़ने पर तुरंत काम आने का भरोसा।
शहर की असली तस्वीर इन चेहरों में भी है
किसी शहर की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों, बड़े बाजारों और ऊंची इमारतों से नहीं होती।
शहर की पहचान उन हाथों से भी होती है, जो बिना किसी शोर के उसकी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं।
मोची की सुई, पंचर वाले का औजार, प्रेस वाले की इस्त्री, नाई की कैंची, चौकीदार की टॉर्च और कचरा बीनने वाले का बोरा—ये सब मिलकर शहर की जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बनाते हैं, जिसकी कीमत अक्सर हमें तब समझ आती है, जब इनमें से कोई एक सेवा अचानक उपलब्ध नहीं होती।
इन चेहरों को एक दिन सलाम तो बनता है
हम रोज इनसे काम लेते हैं। कभी जल्दी में, कभी मोलभाव करते हुए, कभी बिना उनकी ओर ठीक से देखे।
लेकिन अगली बार जब सड़क किनारे कोई मोची जूता सिलता मिले, पंचर वाला टायर खोलता मिले या कोई सफाईकर्मी सुबह-सुबह सड़क साफ करता दिखाई दे, तो एक पल रुककर देखिएगा।
शायद शहर की असली रफ्तार वहीं दिखाई दे, जहां हमें सिर्फ एक छोटी-सी दुकान, एक ठेला या सड़क किनारे बैठा कोई कामगार नजर आता है।
ये शहर के गुमनाम मददगार हैं।
हर दिन हमारी जरूरत बनने वाले चेहरे