नई दिल्ली। जन्म से तय होने वाली सामाजिक पहचान क्या इंसान के वास्तविक वंशानुगत इतिहास की भी पूरी कहानी बताती है? ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित, पिछड़े और आदिवासी जैसे अलग-अलग सामाजिक समुदायों के बीच क्या ऐसे आनुवंशिक संबंध हैं, जो सदियों पुराने साझा अतीत की ओर इशारा करते हैं? बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के शोध से जुड़े दावों ने इन सवालों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
भोपाल से प्रकाशित दैनिक राज एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर चौबे के नेतृत्व में एक दशक से अधिक समय से चल रहे शोध में भारतीय समुदायों के बीच साझा पूर्वजों से जुड़े आनुवंशिक संबंधों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया है कि एक आदिवासी और एक क्षत्रिय समुदाय के बीच लगभग 1,500 वर्ष पुराने साझा पितृवंशीय संबंध के संकेत मिले हैं। गुजरात के पटेल समुदाय के संदर्भ में भी उन्होंने ऐसे संबंधों का उल्लेख किया है।
जाति की दीवारें पुरानी, पूर्वजों की कहानी उससे भी पुरानी?
भारतीय समाज में जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि विवाह, परंपरा, पेशे और सामाजिक हैसियत से भी जुड़ी रही है। समय के साथ इन पहचानों ने अलग-अलग समुदायों के बीच दूरियां पैदा कीं। लेकिन आनुवंशिकी का अध्ययन इस इतिहास के एक दूसरे पहलू को सामने लाता है—सामाजिक रूप से अलग पहचाने जाने वाले समुदायों के पूर्वजों के बीच भी संबंध हो सकते हैं।
प्रोफेसर चौबे ने रिपोर्ट के मुताबिक, अपने शोध में Y क्रोमोसोम के अध्ययन का उल्लेख किया है। यह क्रोमोसोम सामान्यतः पिता से पुत्र को मिलता है और इसके आनुवंशिक संकेतों से पितृवंश की प्राचीन शाखाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
हालांकि, किसी दो समुदायों के बीच साझा पितृवंशीय संबंध मिलना और सभी जातियों के सभी पूर्वजों का एक ही होना दो अलग बातें हैं। Y क्रोमोसोम वंशावली की एक शाखा की जानकारी देता है, संपूर्ण आनुवंशिक इतिहास की नहीं।
आर्य-द्रविड़ विभाजन की बहस भी चर्चा में
रिपोर्ट में प्रोफेसर चौबे ने उत्तर-दक्षिण तथा आर्य-द्रविड़ विभाजन को नस्लीय आधार पर देखने की अवधारणा पर भी सवाल उठाए हैं।
आधुनिक आनुवंशिकी भारतीय आबादी के इतिहास को प्रवास, विभिन्न समूहों के बीच आनुवंशिक मिश्रण और क्षेत्रीय विकास की जटिल प्रक्रिया के रूप में समझती है। आर्य और द्रविड़ जैसी भाषाई-सांस्कृतिक पहचानों को दो पूरी तरह अलग जैविक नस्लों के रूप में देखना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।
फिर भी, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में आनुवंशिक विविधता मौजूद है। इस विषय पर किसी निर्णायक निष्कर्ष के लिए मूल शोधपत्र, उसके नमूनों और वैज्ञानिक निष्कर्षों का अध्ययन जरूरी है।
क्या जाति व्यवस्था बाहर से थोपी गई थी?
प्रोफेसर चौबे के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि भारतीय जाति व्यवस्था का विकास स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों में हुआ और इसे बाहर से नहीं थोपा गया।
यह विषय इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच व्यापक विमर्श का हिस्सा है। जाति व्यवस्था के विकास को किसी एक घटना या कारण से नहीं समझा जा सकता। सामाजिक-आर्थिक शक्ति, राजनीतिक परिस्थितियां, विवाह संबंध, धार्मिक परंपराएं और ऐतिहासिक बदलावों ने अलग-अलग समय में इसकी संरचना को प्रभावित किया है।
इसलिए आनुवंशिक शोध से प्राप्त निष्कर्षों और जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक उत्पत्ति के सवालों को अलग-अलग समझना भी जरूरी है।
विज्ञान का सवाल, समाज के लिए संदेश
इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सामाजिक पहचान और आनुवंशिक वंशावली एक ही चीज नहीं हैं। समुदायों के बीच ऐतिहासिक संबंधों का पता लगाना मानव इतिहास को समझने में मदद करता है, लेकिन DNA किसी व्यक्ति या समुदाय की सामाजिक श्रेष्ठता अथवा हीनता तय नहीं करता।
जाति की पहचान अलग हो सकती है, लेकिन क्या इससे साझा मानवीय इतिहास के तथ्य बदल जाते हैं? यही वह सवाल है, जो इस शोध से जुड़ी चर्चा को प्रयोगशाला से निकालकर समाज के बीच ले आता है।
ब्राह्मण से आदिवासी तक.... क्या साझा हैं पूर्वजों की जड़ें ?
बी एच यू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के शोध की चर्चा, जातीय पहचान की अवधारणा पर नई बहस
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