भोपाल।
फैशन बदलता है, सजनेसंवरने के तरीके बदलते हैं, आभूषणों के डिजाइन बदलते हैं, लेकिन खूबसूरत दिखने की चाह शायद कभी नहीं बदलती। आज महिलाएं बालों को संवारने के लिए क्लिप लगाती हैं, गले में डिजाइनर नेकलेस पहनती हैं और हाथों में कंगन सजाती हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि लगभग 1500 साल पहले भी महिलाओं के श्रृंगार में ये चीजें शामिल थीं।
मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के नचना गांव से मिली एक छोटी-सी प्रतिमा ने इतिहास के इसी दिलचस्प पहलू को सामने ला दिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई में मिली करीब 20 सेंटीमीटर ऊंची इस प्रतिमा में एक महिला को श्रृंगार करते हुए दर्शाया गया है। गुप्तकाल की मानी जा रही यह प्रतिमा बताती है कि उस दौर में भी महिलाओं के सौंदर्यबोध, केश सज्जा और आभूषणों को लेकर कितनी बारीक समझ थी।
एएसआई ने इसे 'लेडी ऑफ नचना' नाम दिया है।
फैशन की कहानी, जो पत्थर पर लिखी गई
धूसर बलुआ पत्थर से बनी इस प्रतिमा को गौर से देखिए तो इसमें केवल एक महिला की आकृति नहीं दिखाई देती, बल्कि उस समय के फैशन की पूरी झलक मिलती है।
महिला के बालों में आकर्षक क्लिप जैसी सजावटी वस्तु दिखाई गई है। गले में सात लड़ियों वाला हार है। कानों में कुंडल, हाथों में कंगन और बाजूबंद उसकी साज-सज्जा को पूर्णता देते हैं।
प्रतिमा की सबसे खास बात इसकी केश सज्जा और श्रृंगार का अंदाज है। कलाकार ने आभूषणों की बनावट से लेकर चेहरे और शरीर की बारीकियों तक को जिस कुशलता से उकेरा है, वह गुप्तकालीन शिल्पकारों की कलात्मक क्षमता का परिचय देता है।
आज के दौर में फैशन डिजाइनर पुराने दौर के परिधानों और आभूषणों से प्रेरणा लेते हैं। नचना से मिली यह प्रतिमा बताती है कि भारतीय सौंदर्य परंपरा की जड़ें कितनी गहरी हैं।
इतिहास में पहली बार नहीं, लेकिन एक दुर्लभ झलक जरूर
प्राचीन भारत में महिलाओं के श्रृंगार का उल्लेख साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला में मिलता है। मंदिरों की दीवारों और प्राचीन प्रतिमाओं में सजी-संवरी नायिकाओं के अनेक रूप दिखाई देते हैं।
लेकिन नचना की इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि इसमें महिला को श्रृंगार की प्रक्रिया से जुड़ी मुद्रा में दिखाया गया है। यह किसी बड़ी प्रतिमा का टूटा हुआ हिस्सा नहीं, बल्कि अपने आप में पूर्ण आकृति है।
मध्यप्रदेश में अब तक मिली मूर्तियों में इस तरह की प्रतिमा को विशेष और दुर्लभ माना जा रहा है।
इससे पहले ग्वालियर के पास ग्यारसपुर की प्रसिद्ध 'लेडी ऑफ ग्यारसपुर' और खजुराहो संग्रहालय में संरक्षित 'सुखनायिका' जैसी प्रतिमाएं महिला सौंदर्य और श्रृंगार की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। नचना की नई खोज इस परंपरा को एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ देती है।
मंदिरों के इतिहास से आगे, अब घर-आंगन की संस्कृति की झलक
पन्ना का नचना गांव पहले से ही गुप्तकालीन स्थापत्य और मंदिरों के लिए जाना जाता है। यहां का पार्वती मंदिर और चौमुखनाथ मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
मंदिरों से जहां उस समय की धार्मिक आस्था, स्थापत्य और शिल्प परंपरा की जानकारी मिलती है, वहीं यह नई प्रतिमा तत्कालीन सामाजिक जीवन के एक अलग पक्ष को सामने लाती है।
यह खोज इतिहास को केवल राजाओं, युद्धों और मंदिरों तक सीमित नहीं रहने देती। यह बताती है कि उस समय का सामान्य जीवन, महिलाओं की व्यक्तिगत सज्जा और सौंदर्य के प्रति उनकी रुचि भी कलात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा थी।
20 सेंटीमीटर की प्रतिमा, 1500 साल की कहानी
करीब 20 सेंटीमीटर की यह प्रतिमा जमीन में लगभग चार फीट नीचे मिली है। इसका पॉलिशयुक्त सतह वाला धूसर बलुआ पत्थर और उस पर उकेरी गई बारीक आकृतियां इसकी कलात्मक गुणवत्ता को दर्शाती हैं।
एएसआई ने फिलहाल इसे सुरक्षित रखा है। आगे इसे संग्रहालय में प्रदर्शित किए जाने की योजना है।
अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. शिवकांत वाजपेयी के अनुसार, नचना की यह प्रतिमा मध्यप्रदेश में मिली ऐसी पहली प्रतिमा है, जिसमें महिला को श्रृंगार करते हुए दर्शाया गया है। इसकी केश सज्जा और बनावट भी अपने आप में अनूठी है।
दरअसल, 'लेडी ऑफ नचना' केवल एक पुरानी मूर्ति नहीं है। यह उस दौर की महिलाओं की पसंद, उनकी सौंदर्य दृष्टि और जीवनशैली का ऐसा दस्तावेज है, जिसे किसी इतिहास की किताब में पढ़ने के बजाय पत्थर पर उकेरा हुआ देखा जा सकता है। 1500 साल बाद भी इस प्रतिमा में सहेजा गया श्रृंगार आज के फैशन से एक दिलचस्प संवाद करता नजर आता है।
1500 साल पहले भी था खूबसूरत दिखने का शौक... बालों में क्लिप, गले में सात लड़ियों का हार और हाथों में कंगन!
पन्ना के नचना गाँव मे मिली 'लेडी ऑफ नचना'नए खोले गुप्तकालीन महिलाओं के शृंगार के राज
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